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कथा: सुनाने वाली कहानियाँ

कान्हा ने उठाया गोवर्धन

पुरानी कथा, नए शब्दों में · लगभग 3 मिनट · 30वाँ सप्ताह

तेज़ बारिश में कान्हा पहाड़ उठाकर सबको सूखा और सुरक्षित रखते हैं।

लगभग 3 मिनटआराम से बैठिए, एक हाथ पेट पर रखिए, और धीरे-धीरे, प्यार से पढ़िए।

हेलो, नन्ही जान। मैं मम्मा हूँ। आज तुम्हारे लिए एक कहानी है।

बहुत पहले की बात है। वृंदावन के हरे-भरे गाँव में एक दिन आसमान सलेटी हो गया।

पहाड़ियों के ऊपर बड़े-बड़े बादल घिर आए। फिर बारिश शुरू हुई। और बारिश भी कैसी! जैसे हर छत पर हज़ार ढोल एक साथ बज रहे हों।

टप, टप, टप... पत्तों पर बूँदें गिरीं। छप, छप... गलियों में पानी भर गया। नदी ऊपर तक आ गई। खेतों में पानी ही पानी हो गया।

गायें एक-दूसरे से सटकर खड़ी हो गईं। बच्चों ने अपनी माँओं का हाथ पकड़ लिया। बड़े-बूढ़े आसमान की ओर देखने लगे। पर कोई घबराया नहीं। सब शांत रहे।

छोटे कान्हा गाँव के बीच में खड़े थे। उनका पीला पटका भीग गया था। आँखें चमक रही थीं। चेहरे पर वही प्यारी-सी मुस्कान थी।

"मेरे साथ चलो," कान्हा बोले। "सबके लिए जगह है।"

वो गोवर्धन पर्वत के पास गए। वो एक बड़ा, गोल पहाड़ था, पेड़ों और घास से भरा हुआ। कान्हा ने उसके किनारे के नीचे अपना हाथ रखा। फिर बहुत आराम से उसे उठा लिया। ऊपर, और ऊपर... जैसे कोई बड़ा-सा हरा छाता हो।

पूरा पहाड़ उन्होंने अपनी छोटी उँगली पर उठा रखा था।

लोग हैरान रह गए। फिर सब मुस्कुराने लगे। "आ जाओ," कान्हा ने फिर पुकारा। "सबके लिए जगह है।"

सब पहाड़ के नीचे आ गए। गायें धीरे-धीरे आईं, गले की घंटियाँ बजाती हुई, टन, टन। बछड़े उछलते-कूदते साथ आए। दादियाँ-नानियाँ लाठी टेकते हुए आईं। बच्चे हँसते हुए दौड़कर आए, बालों से पानी झटकते हुए।

पहाड़ के नीचे सब सूखा था, बड़ा सुकून था। बाहर बारिश ढोल बजाती रही। अंदर सारे परिवार पास-पास बैठे थे।

माँओं ने गरम रोटियाँ और दूध बाँटा। दादाजी लोगों ने पुरानी कहानियाँ सुनाईं। बच्चे ताली वाले खेल खेलने लगे। एक बछड़े ने एक छोटे लड़के का गाल चाट लिया, और सब ज़ोर से हँस पड़े।

दिन पर दिन बारिश होती रही। दिन पर दिन कान्हा पहाड़ उठाए रहे। वो ज़रा भी नहीं थके। बस सबको देखकर मुस्कुराते रहे, और सब उन्हें देखकर मुस्कुराते रहे।

"थक तो नहीं गया, कान्हा?" यशोदा माँ ने धीरे से पूछा।

"नहीं, मैया," कान्हा बोले। "हम सब साथ हैं। सबके लिए जगह है।"

फिर एक सुबह बारिश धीमी हो गई। फिर रुक गई। बादल हट गए। सुनहरी धूप निकल आई। चिड़ियाँ चहचहाने लगीं।

सब बाहर चमकते खेतों में आ गए। घास पर बूँदें मोती जैसी चमक रही थीं। हवा ताज़ी और साफ़ थी।

कान्हा ने पहाड़ को धीरे से वापस उसकी जगह रख दिया, ठीक वहीं, जहाँ वो हमेशा से था। एक पत्ता भी इधर-उधर नहीं हुआ।

गायें खुशी से रंभाईं। बच्चे नाचने लगे। और पूरे गाँव ने अपने छोटे कान्हा को गले से लगा लिया।

कहानी की सीख
“साथ रहें, तो हम सुरक्षित हैं।”

गर्भ संवाद

कान्हा ने सबके ऊपर पहाड़ की छाँव कर दी। मेरा प्यार भी उसी पहाड़ की तरह, हमेशा तुम्हारे ऊपर है। मौसम कैसा भी हो, तुम्हारे ऊपर छाँव है।

इसे धीरे-धीरे बोलकर सुनाइए, चाहें तो अपने शब्दों में।

मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, नन्ही जान। तुम सुरक्षित हो। हम साथ हैं।

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यहाँ हर कहानी प्यार से, शांति से ख़त्म होती है। डराने वाले या दुखी अंत हम नहीं रखते, और पुरानी कथाएँ आसान शब्दों में सुनाते हैं।

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