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गर्भ संस्कार क्या होता है और इसे घर पर कैसे करें?

दादी-नानी के ज़माने से घरों में आने वाले शिशु का स्वागत श्लोकों, कहानियों, लोरियों और माँ के शांत मन से होता आया है। यही गर्भ संस्कार है। जानिए इसका मतलब और इसकी परंपरा, विज्ञान इसके बारे में क्या कहता है और क्या नहीं — और घर पर रोज़ सुकून के पाँच मिनट में इसे कैसे करें।

गर्भशिक्षा की ओर से ·

गर्भ संस्कार क्या है?

गर्भ संस्कार गर्भावस्था की एक पुरानी भारतीय परंपरा है। इसमें माँ रोज़ की छोटी-छोटी, सुकून भरी आदतों से अपने मन का ख़याल रखती है और गर्भ में पल रहे शिशु से जुड़ती है — श्लोक जपकर, कहानियाँ सुनाकर, मधुर संगीत सुनकर और शिशु से बातें करके। ‘गर्भ’ यानी कोख और ‘संस्कार’ यानी वे अच्छी सीख और छाप, जो इंसान को गढ़ती हैं।

  • श्लोक और मंत्र जपना या सुनना
  • शिशु को कहानियाँ पढ़कर सुनाना
  • शिशु से बातें करना, यानी गर्भ संवाद
  • मधुर संगीत, भजन-प्रार्थना और कुछ देर शांत बैठना
  • मन को शांत रखने वाली पहेलियाँ और खेल

बहुत-से लोग इसे ‘गर्भ में शिक्षा’ कहते हैं। हमारे लिए यह रोज़ के वे कुछ पल हैं, जब आप ठहरकर अपने भीतर पल रही नन्ही जान को महसूस करती हैं।

गर्भ संस्कार परंपरा और भावना से जुड़ा, प्यार से निभाया जाने वाला अभ्यास है — कोई डॉक्टरी इलाज नहीं। यह डॉक्टर की देखभाल के साथ चलता है, उसकी जगह कभी नहीं लेता।

गर्भ संस्कार की परंपरा कहाँ से आई?

यह सोच बहुत पुरानी है। हिंदू परंपरा में जीवन के बड़े पड़ावों पर संस्कार किए जाते हैं, और इनमें से कुछ जन्म से पहले ही शुरू हो जाते हैं। होने वाले शिशु के लिए कुछ सबसे पुरानी प्रार्थनाएँ ऋग्वेद (10.184) और अथर्ववेद (6.17) में मिलती हैं।

बाद के महीनों में सीमंतोन्नयन संस्कार होता था, जिसे आज कई परिवार गोदभराई या सीमंतम के नाम से जानते हैं। आश्वलायन गृह्यसूत्र (1.14) के अनुसार इसमें दो वीणा-वादक होने वाली माँ के लिए गीत गाते थे। जन्म होते ही जातकर्म संस्कार में नवजात के कान में धीरे से पहला आशीर्वाद कहा जाता था (आश्वलायन गृह्यसूत्र 1.15)।

आयुर्वेद की चरक संहिता में गर्भ और जन्म पर पूरा एक अध्याय है (शारीर स्थान 8)। चरक कहते हैं कि प्रसव के समय कोई स्नेही, भरोसेमंद स्त्री माँ को इस अध्याय का जन्म-मंत्र सुनाए।

गर्भ संस्कार की सबसे प्यारी कहानी श्रीमद्भागवत पुराण (7.7.15) की है: नारद मुनि गर्भवती कयाधु को ज्ञान देते हैं, और गर्भ में नन्हे प्रह्लाद भी सुनते हैं। तुलसीदास के रामचरितमानस (बालकांड) की जन्म-स्तुति ‘भए प्रगट कृपाला’ आज भी उत्तर भारत के कई घरों में शिशु के आने पर गाई जाती है।

पुराने श्लोकों में कहीं-कहीं ‘पुत्र’ शब्द आता है। आज के कई परिवारों की तरह हम भी उसे ‘संतान’ के अर्थ में पढ़ते हैं — हर श्लोक हर शिशु के लिए है, बेटा हो या बेटी।

क्या गर्भ संस्कार के पीछे कोई विज्ञान है?

कुछ हद तक ही। इसकी कुछ बातें सुनने, आवाज़ और साँस से जुड़े शोध से मेल खाती हैं, पर इसके नाम पर किए जाने वाले कई दावों के पीछे कोई ठोस सबूत नहीं है।

शिशु आपकी आवाज़ सुनने लग सकता है। शोध के अनुसार, गर्भ में शिशु लगभग 19वें सप्ताह से आवाज़ पर प्रतिक्रिया देने लग सकते हैं। यानी पाँचवें महीने के आसपास से आपकी आवाज़ शिशु तक पहुँचने लग सकती है।

नवजात शिशु माँ की आवाज़ ज़्यादा पसंद करता है। एक छोटे-से शोध में, कुछ ही दिन के शिशुओं ने चुसनी चूसने का ढंग बदलकर अपनी माँ की आवाज़ किसी दूसरी महिला की आवाज़ से ज़्यादा बार सुनी। एक और शोध से लगता है कि गर्भावस्था के आख़िरी दिनों तक शिशु माँ की आवाज़ पहचानने लगते हैं।

धीमे जप से साँस धीमी हो सकती है। स्वस्थ वयस्कों ने जब लय में, धीरे-धीरे प्रार्थना या मंत्र पढ़ा, तो उनकी साँसें धीमी हो गईं। धीरे-धीरे साँस लेने से बहुत-से लोगों को सुकून मिलता है। पर यह एक छोटा अध्ययन था, जो गर्भवती महिलाओं पर नहीं हुआ था — इसलिए इसे इशारा भर मानिए, वादा नहीं। जप उतनी ही रफ़्तार से कीजिए, जितनी सहज लगे, और चक्कर आए या साँस फूले, तो रुक जाइए।

पर शोध में इस बात का कोई सबूत नहीं मिलता:

  • कि मंत्र जपने, संगीत सुनने या ‘गर्भ में शिक्षा’ से शिशु ज़्यादा बुद्धिमान बनता है या उसका आईक्यू बढ़ता है।
  • कि केसर वाला दूध, नारियल पानी या कोई भी रस्म शिशु को गोरा बना सकती है, या उसका रंग-रूप या स्वभाव बदल सकती है।
  • कि गर्भ में शिशु शब्दों या श्लोकों का अर्थ समझता है — वह आवाज़ पहचानने लग सकता है, पर बातों का मतलब नहीं।
  • कि पेट पर स्पीकर या हेडफ़ोन लगाकर संगीत सुनाने से शिशु के विकास में मदद मिलती है। शिशु से अपनी सहज, रोज़ की आवाज़ में बात करना ही काफ़ी है।
  • कि गर्भ संस्कार से नॉर्मल डिलीवरी पक्की होती है, प्रसव का दर्द कम होता है या गर्भावस्था की परेशानियाँ टल जाती हैं।
  • कि कोई एक मंत्र दूसरों से ज़्यादा असरदार है या एक दिन छूट जाने से शिशु को कोई नुक़सान पहुँचता है।

स्रोत: गर्भ में शिशु कब से आवाज़ पर प्रतिक्रिया देने लगता है · नवजात शिशु माँ की आवाज़ ज़्यादा पसंद करते हैं · जन्म से पहले माँ की आवाज़ पहचानना · धीमी लय में जप और साँस

गर्भ संस्कार क्या नहीं कर सकता

कई किताबें, कोर्स और वीडियो बड़े-बड़े वादे करते हैं। गर्भ संस्कार जो देता है, वह इससे छोटा है, पर सच्चा है: रोज़ कुछ पल का सुकून, शिशु से बात करने की आदत और अपने परिवार की परंपराओं से जुड़ाव।

पर कोई भी अभ्यास, चाहे कितने भी प्यार से किया जाए, ये काम नहीं कर सकता:

  • यह शिशु का लिंग न तय कर सकता है, न बदल सकता है। गर्भ संस्कार हर संतान के लिए है। भारत में पीसीपीएनडीटी अधिनियम, 1994 के तहत जन्म से पहले शिशु का लिंग चुनना या पता करना ग़ैर-क़ानूनी है।
  • यह शिशु को गोरा या सुंदर नहीं बना सकता। रंग-रूप ज़्यादातर जीन से तय होता है।
  • यह बच्चे की बुद्धि या स्वभाव तय नहीं कर सकता। ये जीन, सेहत, प्यार और परवरिश से बरसों में बनते हैं।
  • यह नॉर्मल डिलीवरी की गारंटी नहीं दे सकता। हर सुरक्षित जन्म अच्छा जन्म है — सिज़ेरियन भी।
  • यह गर्भावस्था की देखभाल की जगह नहीं ले सकता — चेकअप, स्कैन, टेस्ट, आयरन और फ़ॉलिक एसिड की गोलियाँ और डॉक्टर की सलाह।

गर्भ संस्कार कब से शुरू करें?

जब मन करे, तभी से — कोई महीना ग़लत नहीं, और देर कभी नहीं होती। परंपरा तो गर्भ ठहरने से पहले ही, होने वाले शिशु के लिए प्रार्थनाओं से शुरू हो जाती है। कई माँएँ गर्भ का पता चलते ही शुरू कर देती हैं, तो कुछ पाँचवें महीने से, जब शिशु आवाज़ सुनकर हरकत करने लग सकता है।

सातवें या आठवें महीने में यह पढ़ रही हैं? तो आज से ही शुरू कीजिए। आज के पाँच मिनट, कल की किसी बढ़िया योजना से कहीं बेहतर हैं।

स्रोत: गर्भ में शिशु कब से आवाज़ पर प्रतिक्रिया देने लगता है

गर्भ संस्कार महीने-दर-महीने: किस महीने में क्या करें

बहुत-सी माँएँ पूछती हैं कि प्रेगनेंसी में कौन-सा मंत्र पढ़ना चाहिए। हमारी 40 सप्ताह की योजना में हर हफ़्ते दोहराने के लिए एक श्लोक है। नीचे उन्हीं में से कुछ श्लोक हैं, और हर महीने के लिए एक छोटा-सा सुझाव।

महीनों का यह हिसाब आख़िरी माहवारी के पहले दिन से गिने गए हफ़्तों पर टिका है, इसलिए यह बस एक अंदाज़ा है। तारीख़ें वही मानिए, जो आपके डॉक्टर बताएँ। कोई और श्लोक मन को छू जाए, तो वही जपिए।

1–4 सप्ताह

पहला महीना: आशीर्वाद से शुरुआत

बहुत-सी महिलाओं को इस महीने के आख़िर में या उसके बाद गर्भ का पता चलता है, इसलिए देर से शुरू करने की फ़िक्र न करें। योजना की शुरुआत होने वाले शिशु के लिए भारत की सबसे पुरानी प्रार्थनाओं में से एक से होती है, जो ऋग्वेद में है। साथ में है गीता का वह श्लोक, जिसमें श्रीकृष्ण पूरी सृष्टि को एक गर्भ की तरह देखते हैं। इन्हें धीरे-धीरे पढ़िए — मन हो तो किसी अपने के साथ।

और श्लोक: संतान की कामना और शुरुआती हफ़्ते

5–8 सप्ताह

दूसरा महीना: जैसे धरती पेड़ों को थामे है

इन हफ़्तों में थकान, जी मिचलाना और चिंता हो सकती है। इस महीने के श्लोक अथर्ववेद के एक सूक्त से हैं: जैसे धरती पेड़ों और पहाड़ों को थामे रहती है, वैसे ही आपका शिशु सुरक्षित सँभला रहे। हर हफ़्ते एक श्लोक जपिए। मुश्किल दिनों में एक धीमी पंक्ति भी काफ़ी है। यह प्रार्थना मन का सहारा है। असली सुरक्षा डॉक्टर की देखभाल से मिलती है। अगर ख़ून आए, दर्द हो या उल्टियाँ बहुत हो रही हों, तो बिना देर किए डॉक्टर को दिखाएँ।

और श्लोक: गर्भ रक्षा

9–12 सप्ताह

तीसरा महीना: यह वक़्त भी गुज़र जाएगा

पहली तिमाही के आख़िर में अक्सर स्कैन होते हैं, टेस्ट के नतीजे आते हैं, और मन में उम्मीद के साथ थोड़ा डर भी रहता है। गीता का एक श्लोक याद दिलाता है कि सर्दी-गर्मी, सुख-दुख आते-जाते रहते हैं। सबसे सरल जप है लंबा, हल्का-सा ‘ॐ’, जिसमें बाहर जाती साँस अपने-आप धीरे-धीरे लंबी हो जाती है। इसे लंबा खींचने के लिए ज़ोर मत लगाइए।

और श्लोक: पहली तिमाही में राहत

पहली तिमाही के खेल और कहानियाँ: सुकून भरे पैटर्न · मीरा का इंतज़ार · चूड़ी सजाओ · चाँदनी रात · ध्रुव तारा कैसे बना · रंगोली के रंग

13–17 सप्ताह

चौथा महीना: लौटती ताज़गी

दूसरी तिमाही में बहुत-सी माँओं की ताज़गी लौट आती है। पाँच मिनट की आदत पक्की करने का यही अच्छा समय है। 13 से 16 सप्ताह तक के श्लोक देवी माँ के हैं: तिरुकरुकावूर मंदिर की गर्भरक्षाम्बिका देवी के श्लोक, जिनका स्तोत्र दक्षिण भारत के कई परिवार पूरी गर्भावस्था में पढ़ते हैं, और गोद में शिशु लिए स्कंदमाता का श्लोक। महीने के आख़िर में आता है तैत्तिरीय उपनिषद् का मंत्र, ‘हम दोनों साथ-साथ सुरक्षित रहें’ — माँ और शिशु के लिए कितनी सुंदर बात।

और श्लोक: गर्भ रक्षा · शिशु से जुड़ाव

18–22 सप्ताह

पाँचवाँ महीना: अब शिशु सुनने लग सकता है

लगभग 19वें सप्ताह से शिशु आवाज़ सुनकर हरकत करने लग सकता है। गर्भ संवाद शुरू करने का यही सहज समय है — शिशु से रोज़ बातें कीजिए, कुछ पढ़कर सुनाइए, गुनगुनाइए। इस महीने मधुराष्टकम् गाकर देखिए, जो नन्हे कृष्ण पर लोरी जैसा मीठा स्तोत्र है। और पढ़िए वह कहानी, जिसमें नारद मुनि गर्भवती कयाधु को उपदेश देते हैं। शिशु शब्दों का अर्थ नहीं समझेगा, पर आपकी आवाज़ पहचानने लग सकता है।

स्रोत: गर्भ में शिशु कब से आवाज़ पर प्रतिक्रिया देने लगता है · जन्म से पहले माँ की आवाज़ पहचानना

और श्लोक: शिशु से जुड़ाव

23–26 सप्ताह

छठा महीना: अच्छे गुणों को बोलकर दोहराइए

इस महीने के श्लोक गुणों के बारे में हैं: उजले मन के लिए गायत्री मंत्र, और गीता के ‘दैवी गुण’, जैसे निडरता, सच्चाई और दया। इन्हें बोलना ख़ुद से पूछने जैसा है कि आप कैसी माँ बनना चाहती हैं। ये उम्मीद भरी प्रार्थनाएँ हैं। इनसे बच्चे के गुण तय नहीं होते।

और श्लोक: संतान के अच्छे गुण · शिशु से जुड़ाव

दूसरी तिमाही के खेल और कहानियाँ: तिरछी लकीरें · चीकू की खोज · छिपी चूड़ियाँ · सतरंगी बगिया · भक्त प्रह्लाद का अटूट विश्वास · छोटे-बड़े स्टैंड · चूड़ी सजाओ प्लस

27–30 सप्ताह

सातवाँ महीना: तीसरी तिमाही की शुरुआत

कई घरों में छठे से आठवें महीने के बीच गोदभराई या सीमंतम की रस्म होती है। इसमें ऋग्वेद का वह मंत्र पढ़ा जाता है, जो पूर्णिमा की देवी राका से प्रार्थना है। उसमें एक प्यारी छवि है — मानो शिशु को कभी न टूटने वाली सुई से टाँका-टाँका जोड़ा जा रहा हो। इसी महीने जन्म से जुड़े सबसे जाने-माने वैदिक मंत्रों में से एक भी है, जो कमल के तालाब पर बहती हवा जैसा कोमल है। साथ में है महामृत्युंजय मंत्र, जिसमें शिव को ‘पुष्टिवर्धन’ यानी पोषण देने वाला कहा गया है।

और श्लोक: प्रसव की तैयारी · माँ की सेहत और पोषण

31–35 सप्ताह

आठवाँ महीना: मन को प्रसव के लिए तैयार कीजिए

अब नींद आने में परेशानी हो सकती है, और ध्यान बार-बार डिलीवरी पर जाता है। अथर्ववेद का एक मंत्र प्रार्थना करता है कि माँ तनाव छोड़े और सही समय पर जन्म देने को तैयार हो। तुलसीदास का ‘भए प्रगट कृपाला’ शिशु के आने की ख़ुशी से भरा है। ये श्लोक मन शांत रखने में मदद कर सकते हैं, पर डिलीवरी कैसी होगी, यह तय नहीं करते। प्रसव के समय साँस कैसे लें, यह अभी से डॉक्टर या नर्स से पूछ लीजिए, ताकि आप पहले से इसका अभ्यास कर सकें।

और श्लोक: प्रसव की तैयारी · नींद और शांत मन

36–40 सप्ताह

नौवाँ महीना: प्रसव के लिए जाने-पहचाने शब्द

अब छोटे, जाने-पहचाने श्लोक चुनिए, जो ज़ुबान पर चढ़े हों और आसानी से याद आ जाएँ। ऋग्वेद का एक जन्म-मंत्र लहरों की तरह बहता है — हवा, जंगल और सागर। दूसरे मंत्र में वही कामना है, जो हर परिवार की होती है: ‘जीवित माँ से, जीवित और सही-सलामत’ शिशु। प्रसव के समय सबसे पहले डॉक्टर या नर्स की बात मानिए। जप बस मन का सहारा है। कुछ भी ठीक न लगे, तो तुरंत अस्पताल जाइए। शिशु के आने पर उसके स्वागत के श्लोक भी तैयार हैं।

और श्लोक: प्रसव का समय · शिशु का स्वागत

तीसरी तिमाही के खेल और कहानियाँ: तारे और दिल · चंदा की लोरी · चूड़ियों के जोड़े · प्यारा परिवार · अभिमन्यु और चक्रव्यूह · फूलों की माला

घर पर गर्भ संस्कार कैसे करें: रोज़ 5 मिनट की विधि

  1. 01

    खेलिए या पढ़िए (2 मिनट)

    आराम से बैठिए और एक हाथ पेट पर रखिए। कोई हल्की पहेली या जोड़ी मिलाओ खेल खेलिए, या शिशु को एक छोटी कहानी पढ़कर सुनाइए। शुरुआती महीनों में यह आपके सुकून का पल है। आगे चलकर आपकी आवाज़ शिशु तक भी पहुँचने लग सकती है।

  2. 02

    एक श्लोक जपिए (2 मिनट)

    इस हफ़्ते का श्लोक चुनिए, या अपना कोई प्रिय छोटा श्लोक। धीरे-धीरे 3 या 11 बार जपिए। साँस सहज रखिए, रोकिए मत। चक्कर आए या साँस फूले, तो रुककर आराम कीजिए। थकान हो, तो बस सुन लीजिए, या घर में किसी से पढ़कर सुनाने को कहिए। सुन लेना भी काफ़ी है।

  3. 03

    शिशु से बातें कीजिए (1 मिनट)

    यही गर्भ संवाद है। शिशु को अपने दिन के बारे में बताइए, अभी-अभी सुनाई कहानी के बारे में, या यह कि घर में कौन-कौन उसका इंतज़ार कर रहा है। किसी तैयारी की ज़रूरत नहीं, बस आपकी आवाज़ चाहिए।

स्रोत

हम किसी शोध की बस उतनी ही बात करते हैं, जितनी उसमें सच में पाई गई। ज़्यादातर शोध थोड़े-से लोगों पर हुए हैं, और कोई भी शोध आपके डॉक्टर की सलाह की जगह नहीं ले सकता। ज़रूरी सूचना पढ़ें

  • गर्भ में शिशु कब से आवाज़ पर प्रतिक्रिया देने लगता है

    शोध में क्या पता चला
    माँ के पेट पर रखे स्पीकर से आवाज़ सुनाने पर, गर्भ में शिशु सबसे पहले लगभग 19वें सप्ताह में हरकत करते दिखे। 27वें सप्ताह तक लगभग सभी शिशु भारी, नीचे सुर वाली आवाज़ों पर प्रतिक्रिया देने लगे थे।
    यह शोध क्या नहीं बताता
    इसमें सिर्फ़ ‘बीप’ जैसी सादी ध्वनियाँ सुनाई गई थीं — न बोली, न संगीत, न जप। इसलिए यह नहीं बताता कि शिशु शब्द समझते हैं, या श्लोक, कहानी और संगीत सुनने से उन्हें कोई फ़ायदा होता है।

    Hepper & Shahidullah (1994). Development of fetal hearing. Archives of Disease in Childhood - Fetal and Neonatal Edition 71(2):F81-F87.

    शोध का सारांश पढ़ें (अंग्रेज़ी में)पूरा शोध पढ़ें (अंग्रेज़ी में, मुफ़्त)

  • नवजात शिशु माँ की आवाज़ ज़्यादा पसंद करते हैं

    शोध में क्या पता चला
    एक छोटे-से शोध में, कुछ ही दिन के नवजात शिशुओं ने चुसनी चूसने का ढंग बदलकर अपनी माँ की आवाज़ किसी दूसरी महिला की आवाज़ से ज़्यादा बार सुनी। यानी जन्म के पहले दिनों से ही शिशु माँ की आवाज़ को ज़्यादा पसंद करते हैं।
    यह शोध क्या नहीं बताता
    इस शोध में गर्भावस्था के दौरान कुछ नहीं परखा गया। इसलिए यह साबित नहीं करता कि यह पसंद गर्भ में ही बनी। यह भी नहीं दिखाता कि गर्भावस्था में बात करने, पढ़कर सुनाने या जप करने से शिशु ज़्यादा सेहतमंद या होशियार होते हैं, या माँ से उनका जुड़ाव गहरा होता है।

    DeCasper & Fifer (1980). Of human bonding: newborns prefer their mothers' voices. Science 208(4448):1174-1176.

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  • जन्म से पहले माँ की आवाज़ पहचानना

    शोध में क्या पता चला
    गर्भावस्था के आख़िरी दिनों में, जब शिशुओं को उनकी अपनी माँ के पढ़ने की रिकॉर्डिंग सुनाई गई तो उनकी धड़कन बढ़ गई, और किसी अनजान महिला की आवाज़ पर घट गई। इससे लगता है कि जन्म से पहले ही शिशु माँ की आवाज़ को दूसरी आवाज़ों से अलग पहचान सकते हैं।
    यह शोध क्या नहीं बताता
    यह नहीं दिखाता कि शिशु शब्द समझते हैं, या आपकी आवाज़ सुनने से उनकी सेहत या विकास बेहतर होता है। यह प्रयोगशाला का परीक्षण था, जिसमें रिकॉर्डिंग पेट के पास तेज़ आवाज़ में बजाई गई — यह रोज़ की बातचीत जैसा नहीं था।

    Kisilevsky et al. (2003). Effects of experience on fetal voice recognition. Psychological Science 14(3):220-224.

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  • धीमी लय में जप और साँस

    शोध में क्या पता चला
    23 स्वस्थ वयस्कों पर हुए इस शोध में, प्रार्थना या मंत्र को धीमी लय में बोलने से उनकी साँस धीमी होकर लगभग 6 बार प्रति मिनट रह गई (आराम के समय यह लगभग 14 बार थी)। जप के दौरान उनकी धड़कन का स्वाभाविक उतार-चढ़ाव भी बढ़ा और साँस के साथ लय में आ गया।
    यह शोध क्या नहीं बताता
    इसमें न गर्भवती महिलाएँ थीं, न संस्कृत श्लोक, न शिशु। असर बस थोड़ी देर के लिए, प्रयोगशाला में मापा गया, और यह गर्भावस्था, प्रसव या शिशु के लिए कोई सेहत-लाभ नहीं दिखाता। ‘6 साँस प्रति मिनट’ बस मापा गया नतीजा है, कोई लक्ष्य नहीं जिसे पाने की कोशिश करनी हो।

    Bernardi et al. (2001). Effect of rosary prayer and yoga mantras on autonomic cardiovascular rhythms: comparative study. BMJ 323(7327):1446-1449.

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