श्लोक

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गर्भ संस्कार के पावन श्लोक, माँ और शिशु के लिए।

हज़ारों सालों से भारतीय परिवार गर्भ संस्कार के मंत्रों और श्लोकों की मधुर ध्वनि से नन्हे मेहमान का स्वागत करते आए हैं। वैदिक काल में गर्भ के लिए मंत्र पढ़े जाते थे, और सीमंतोन्नयन संस्कार में होने वाली माँ के लिए गीत-संगीत होता था। आयुर्वेद कहता है कि गर्भवती स्त्री को मीठी बातें सुननी चाहिए और उससे प्यार से पेश आना चाहिए। आज विज्ञान भी इसकी कुछ बातों को सही मानता है: गर्भावस्था के बीच के महीनों से शिशु आवाज़ें सुनकर हरकत करने लगता है, आख़िरी महीनों में आपकी आवाज़ पहचानने लगता है, और जन्म के बाद आपकी आवाज़ को दूसरी आवाज़ों से ज़्यादा पसंद करता है।

शुरुआत इस श्लोक से

असतो मा सद्गमय ।तमसो मा ज्योतिर्गमय ।मृत्योर्मा अमृतं गमय ॥

अँधेरे से उजाले की ओर ले चलो

मुझे असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।

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स्रोत

हम किसी शोध की बस उतनी ही बात करते हैं, जितनी उसमें सच में पाई गई। ज़्यादातर शोध थोड़े-से लोगों पर हुए हैं, और कोई भी शोध आपके डॉक्टर की सलाह की जगह नहीं ले सकता। ज़रूरी सूचना पढ़ें

  • गर्भ में शिशु कब से आवाज़ पर प्रतिक्रिया देने लगता है

    शोध में क्या पता चला
    माँ के पेट पर रखे स्पीकर से आवाज़ सुनाने पर, गर्भ में शिशु सबसे पहले लगभग 19वें सप्ताह में हरकत करते दिखे। 27वें सप्ताह तक लगभग सभी शिशु भारी, नीचे सुर वाली आवाज़ों पर प्रतिक्रिया देने लगे थे।
    यह शोध क्या नहीं बताता
    इसमें सिर्फ़ ‘बीप’ जैसी सादी ध्वनियाँ सुनाई गई थीं — न बोली, न संगीत, न जप। इसलिए यह नहीं बताता कि शिशु शब्द समझते हैं, या श्लोक, कहानी और संगीत सुनने से उन्हें कोई फ़ायदा होता है।

    Hepper & Shahidullah (1994). Development of fetal hearing. Archives of Disease in Childhood - Fetal and Neonatal Edition 71(2):F81-F87.

    शोध का सारांश पढ़ें (अंग्रेज़ी में)पूरा शोध पढ़ें (अंग्रेज़ी में, मुफ़्त)

  • जन्म से पहले माँ की आवाज़ पहचानना

    शोध में क्या पता चला
    गर्भावस्था के आख़िरी दिनों में, जब शिशुओं को उनकी अपनी माँ के पढ़ने की रिकॉर्डिंग सुनाई गई तो उनकी धड़कन बढ़ गई, और किसी अनजान महिला की आवाज़ पर घट गई। इससे लगता है कि जन्म से पहले ही शिशु माँ की आवाज़ को दूसरी आवाज़ों से अलग पहचान सकते हैं।
    यह शोध क्या नहीं बताता
    यह नहीं दिखाता कि शिशु शब्द समझते हैं, या आपकी आवाज़ सुनने से उनकी सेहत या विकास बेहतर होता है। यह प्रयोगशाला का परीक्षण था, जिसमें रिकॉर्डिंग पेट के पास तेज़ आवाज़ में बजाई गई — यह रोज़ की बातचीत जैसा नहीं था।

    Kisilevsky et al. (2003). Effects of experience on fetal voice recognition. Psychological Science 14(3):220-224.

    शोध का सारांश पढ़ें (अंग्रेज़ी में)

  • नवजात शिशु माँ की आवाज़ ज़्यादा पसंद करते हैं

    शोध में क्या पता चला
    एक छोटे-से शोध में, कुछ ही दिन के नवजात शिशुओं ने चुसनी चूसने का ढंग बदलकर अपनी माँ की आवाज़ किसी दूसरी महिला की आवाज़ से ज़्यादा बार सुनी। यानी जन्म के पहले दिनों से ही शिशु माँ की आवाज़ को ज़्यादा पसंद करते हैं।
    यह शोध क्या नहीं बताता
    इस शोध में गर्भावस्था के दौरान कुछ नहीं परखा गया। इसलिए यह साबित नहीं करता कि यह पसंद गर्भ में ही बनी। यह भी नहीं दिखाता कि गर्भावस्था में बात करने, पढ़कर सुनाने या जप करने से शिशु ज़्यादा सेहतमंद या होशियार होते हैं, या माँ से उनका जुड़ाव गहरा होता है।

    DeCasper & Fifer (1980). Of human bonding: newborns prefer their mothers' voices. Science 208(4448):1174-1176.

    शोध का सारांश पढ़ें (अंग्रेज़ी में)

हम हर श्लोक हर संतान के लिए सुझाते हैं — बेटा हो या बेटी। भारत में पीसीपीएनडीटी अधिनियम, 1994 के तहत गर्भ में शिशु के लिंग की जाँच करना या कराना ग़ैर-क़ानूनी है।

श्लोक जपना एक आध्यात्मिक और भावनात्मक अभ्यास है। यह गर्भावस्था की नियमित जाँच, स्कैन, टेस्ट, आयरन और फ़ॉलिक एसिड की गोलियों, अच्छे खान-पान और डॉक्टर की सलाह का साथ दे सकता है, पर उनकी जगह कभी नहीं ले सकता। अगर ख़ून आए, दर्द हो, पानी रिसे, शिशु की हलचल कम लगे, तेज़ सिरदर्द हो, सूजन हो या कोई भी चिंता हो, तो तुरंत अपने डॉक्टर या अस्पताल से संपर्क करें। अगर आपकी गर्भावस्था हाई-रिस्क है, तो कोई भी प्राणायाम या योग शुरू करने से पहले डॉक्टर से पूछ लें। अगर ज़्यादातर दिन मन उदास रहता है या घबराहट होती है, तो ऐसा बहुत-सी माँओं के साथ होता है और इसका इलाज है — अपने डॉक्टर को ज़रूर बताएँ। पूरी ज़रूरी सूचना पढ़ें