शांति: सुकून भरी कहानियाँ
आम के बाग़ में जुगनू
नई कहानी · लगभग 3 मिनट · 15वाँ सप्ताह
गर्मी की रात में, जुगनू एक-एक करके आम के बाग़ को रोशन करते हैं।
हेलो, नन्ही जान। मैं मम्मा हूँ। आज तुम्हारे लिए एक कहानी है।
गर्मियों की एक गरम रात है। हम धीरे-धीरे आम के पुराने बाग़ में चलते हैं। पैरों के नीचे घास नरम है। हवा गुनगुनी है, जैसे कोई प्यार से गले लगा रहा हो।
पेड़ ऊँचे हैं, अँधेरे में डूबे हुए। उनके पत्ते सरसराते हैं... श्श्श... श्श्श... ऊपर आसमान चुपचाप तारों से भरा है।
हम सबसे बड़े पेड़ के नीचे एक नरम चटाई पर बैठ जाते हैं। उसके चौड़े तने से पीठ टिका लेते हैं। बाग़ में बहुत अँधेरा है। हम इंतज़ार करते हैं।
सुनो... एक झींगुर गा रहा है, चीं... चीं... तालाब से एक मेंढक बुला रहा है, टर्र... टर्र... दूर कहीं एक उल्लू एक बार बोलता है, फिर चुप हो जाता है।
फिर... देखो! एक नन्ही सी रोशनी। वो जलती है... और बुझती है। एक।
हम बिल्कुल चुपचाप बैठे रहते हैं, ताकि वो बेफ़िक्र रहे। टिम... दो। एक और रोशनी नीची डाली के पास चमकती है। टिम... तीन। एक और, घास के ऊपर।
एक और नन्ही रोशनी... बस हमारे लिए चमक रही है।
चार... पाँच... वो धीरे-धीरे ऊपर तैरते हैं, जैसे नन्हे-नन्हे दीये। छह... हमारे पैरों के पास। सात... पुराने कुएँ के पास।
बाग़ धीरे-धीरे जाग रहा है। रोशनियाँ तैरती हैं, नाचती हैं। हरी-सुनहरी, नरम और प्यारी। आठ... नौ... दस। वो पत्तों के बीच टिमटिमाते हैं, जैसे तारे नीचे खेलने उतर आए हों।
एक और नन्ही रोशनी... बस हमारे लिए चमक रही है।
अब हम गिनना छोड़ देते हैं। इतने सारे हैं कि गिन ही नहीं सकते! पूरा बाग़ जगमगा रहा है। पेड़ ऐसे लग रहे हैं जैसे दिवाली की रात छोटी-छोटी लड़ियों से सजे हों।
एक गुनगुनी हवा पत्तों के बीच से गुज़रती है। जुगनू उसके साथ हिलते-डुलते हैं। उन्हें कोई जल्दी नहीं। वो शोर नहीं करते। वो बस चमकते हैं, चुपचाप और खुशी से।
हमारे अंदर धीरे-धीरे एक प्यारी-सी खुशी उठती है। चेहरे पर एक छोटी सी, नरम मुस्कान आ जाती है। इतनी सीधी-सादी चीज़... और इतनी सुंदर।
एक जुगनू तैरता हुआ हमारे पास आता है। वो पल भर के लिए हमारे हाथ पर बैठ जाता है। कितना हल्का! हमें पता भी नहीं चलता। टिम... टिम... फिर वो उड़कर बाकी जुगनुओं से जा मिलता है।
एक और नन्ही रोशनी... बस हमारे लिए चमक रही है।
अब आँखें भारी हो रही हैं। झींगुर और धीरे गाने लगे हैं। रोशनियाँ धीमी और सपनों जैसी हो गई हैं। हम रात की गुनगुनी हवा अंदर लेते हैं... और बाहर छोड़ते हैं। बाग़ हमें सुरक्षित और शांत थामे हुए है। और नन्ही रोशनियाँ चमकती रहती हैं, जब तक हम धीरे-धीरे नींद में खो जाते हैं।
“छोटी-छोटी रोशनियाँ रात को सुंदर बना देती हैं।”
गर्भ संवाद
जुगनुओं ने एक-एक करके पूरा बाग़ रोशन कर दिया। देखो, छोटी-छोटी रोशनियाँ तुम्हारे लिए चमक रही हैं। तुमसे मेरा दिल भी जगमगा उठता है, मेरी जान।
इसे धीरे-धीरे बोलकर सुनाइए, चाहें तो अपने शब्दों में।
मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, नन्ही जान। तुम सुरक्षित हो। हम साथ हैं।
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