ऋग्वेद का सूक्त 10.184 आने वाली संतान के लिए रची गई भारत की सबसे पुरानी प्रार्थनाओं में से एक है। इसका पहला मंत्र ‘विष्णुर्योनिं कल्पयतु’ से शुरू होता है। इसमें विष्णु से गर्भ को तैयार करने, त्वष्टा से शिशु का रूप गढ़ने और धाता से शिशु को कोख में बसाने की विनती है। सूक्त छोटा है, बस तीन मंत्रों का, और यहाँ तीनों दिए गए हैं। पहला मंत्र चरक संहिता में भी आता है, और गर्भाधान संस्कार में भी अक्सर पढ़ा जाता है — वह पारंपरिक संस्कार, जो संतान की कामना करने वाले दंपती करते हैं।
दूसरे मंत्र में दो मातृ-देवियों — सिनीवाली और सरस्वती — और जुड़वाँ वैद्य देवता अश्विनीकुमारों से प्रार्थना है कि वे शुरुआती गर्भ को थामे रखें। तीसरे मंत्र में दसवें महीने में शिशु के जन्म की कामना है। वेदों में महीने चाँद के हिसाब से गिने जाते थे, यानी ये हमारे लगभग नौ महीने हैं। आम तौर पर दंपती सुबह साथ बैठकर यह सूक्त धीरे-धीरे 3 या 11 बार जपते हैं। यह संतान की कामना के दिनों और शुरुआती हफ़्तों के लिए है, और प्रसव की तारीख़ पास आने पर तीसरा मंत्र फिर से दोहराना अच्छा लगता है।
यह एक आशीर्वाद है, उम्मीद जताने का एक ढंग — गर्भ ठहरने का इलाज नहीं। अगर गर्भ ठहरने में समय लग रहा है, या शुरुआती हफ़्तों में कोई भी चिंता है, तो डॉक्टर से ज़रूर मिलिए। प्रार्थना और इलाज साथ-साथ चलते हैं। ज़रूरी सूचना पढ़ें