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6 श्लोक · गर्भधारण से पहले और 8वें सप्ताह तक

गर्भधारण से पहले: संतान की कामना कर रहे दंपती के लिए श्लोक

यहाँ नए जीवन के लिए रची गई भारत की कुछ सबसे पुरानी प्रार्थनाएँ हैं। तीन श्लोक ऋग्वेद के एक ऐसे सूक्त से हैं, जो गर्भधारण की कामना से ही रचा गया था। दो श्लोक भगवद्गीता से हैं, जिनमें श्रीकृष्ण सृष्टि को समझाने के लिए गर्भ का ही उदाहरण देते हैं — इनमें से एक तो पिता के लिए बड़ा प्यारा श्लोक है। संतान गोपाल मंत्र की वह एक पंक्ति भी है, जिसमें बस संतान का आशीर्वाद माँगा गया है।

ये श्लोक आप दोनों के लिए हैं, साथ बैठकर पढ़ने के लिए — संतान की कोशिश के दिनों में, और चाहें तो गर्भ के लगभग आठवें सप्ताह तक। कोई एक श्लोक चुन लीजिए। सुबह दोनों साथ बैठकर उसे धीरे-धीरे 3 या 11 बार जपिए। संस्कृत पढ़ने की आदत न हो, तो पहले उसका अर्थ बोलकर पढ़िए — शब्द धीरे-धीरे ज़बान पर चढ़ जाएँगे।

ये श्लोक उम्मीद की प्रार्थनाएँ हैं, कोई इलाज नहीं — जप से गर्भ नहीं ठहरता। अगर इंतज़ार लंबा खिंच रहा है, तो डॉक्टर से मिलने में देर मत कीजिए। और याद रखिए, संतान जैसी भी हो, वह आशीर्वाद ही है। ज़रूरी सूचना पढ़ें

इन श्लोकों को कैसे जपें

नीचे के हर श्लोक के लिए — जब तक उसके साथ कुछ और न लिखा हो।

सबसे अच्छा समय
सुबह, दोनों साथ मिलकर
जपने का तरीका
धीरे-धीरे 3 या 11 बार जपें
कौन जप सकता है
माँ और पिता, साथ मिलकर
सबसे सही सप्ताह
गर्भधारण से पहले और 8वें सप्ताह तक

सच कहें तोयह एक आशीर्वाद है, उम्मीद जताने का एक ढंग। यह गर्भ ठहरने में मदद करने वाला इलाज नहीं है।

गर्भधारण और कोख में आकार लेते शिशु के लिए आशीर्वाद

विष्णु गर्भ को तैयार करें

विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु ।आ सिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते ॥

ऋग्वेद 10.184.1 (चरक संहिता, शारीर स्थान 8 में भी)

अर्थ

विष्णु गर्भ को तैयार करें। त्वष्टा शिशु का रूप गढ़ें। प्रजापति बीज दें। धाता शिशु को आपकी कोख में बसाएँ।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

आने वाली गर्भावस्था के लिए रची गई यह भारत की सबसे पुरानी प्रार्थनाओं में से एक है। संतान की कामना कर रहे दंपती इसे पढ़ते हैं, और शुरुआती हफ़्तों में माँएँ भी।

इससे क्या मिल सकता है

दंपती के लिए साथ बिताया उम्मीद भरा एक शांत पल। इसे साथ मिलकर बोलने से गर्भधारण की कोशिश में होने वाला तनाव कम हो सकता है।

यह भी देखें: ऋग्वेद 10.184: आने वाली संतान के लिए वैदिक सूक्त

शुरुआती गर्भ को थामे रखने के लिए

हे सिनीवाली, हे सरस्वती, शिशु को थामे रखो

गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि सरस्वति ।गर्भं ते अश्विनौ देवावा धत्तां पुष्करस्रजा ॥

ऋग्वेद 10.184.2

अर्थ

हे सिनीवाली, शिशु को थामे रखो। हे सरस्वती, शिशु को थामे रखो। कमल की माला पहने जुड़वाँ वैद्य देवता, अश्विनीकुमार, आपके शिशु को थामे रखें।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

इसमें दो मातृ-देवियों और वैद्य देवताओं से शुरुआती गर्भ को थामे रखने की प्रार्थना की गई है। यह 1–12 सप्ताह के लिए सही है, जब बहुत-सी माँओं को सबसे ज़्यादा चिंता होती है।

इससे क्या मिल सकता है

यह एहसास कि कोई आपको थामे हुए है और आपका ख़याल रख रहा है। पेट पर हाथ रखकर धीरे से फुसफुसाने के लिए एक कोमल श्लोक।

यह भी देखें: ऋग्वेद 10.184: आने वाली संतान के लिए वैदिक सूक्त

दिन पूरे होने पर शिशु के जन्म की प्रार्थना

दसवें महीने में जन्म

हिरण्ययी अरणी यं निर्मन्थतो अश्विना ।तं ते गर्भं हवामहे दशमे मासि सूतवे ॥

ऋग्वेद 10.184.3

अर्थ

जिस शिशु को अश्विनीकुमारों ने ऐसे जगाया है, जैसे सोने की लकड़ियों को रगड़कर आग सुलगाई जाती है — उस शिशु को हम दसवें महीने में जन्म लेने के लिए पुकारते हैं।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

इसी श्लोक से गर्भावस्था का वैदिक सूक्त पूरा होता है, और इसमें दिन पूरे होने पर जन्म की आस है। वेदों के ‘दस महीने’ चाँद के हिसाब से गिने गए महीने हैं — यानी हमारे लगभग नौ महीने।

इससे क्या मिल सकता है

पूरे दिनों के शिशु की एक उम्मीद भरी तस्वीर। शुरुआती हफ़्तों में और फिर प्रसव की तारीख़ नज़दीक आने पर इसे दोहराना अच्छा रहता है।

यह भी देखें: ऋग्वेद 10.184: आने वाली संतान के लिए वैदिक सूक्त

गर्भावस्था को सृष्टि मानकर उसका सम्मान

मैं ही महान गर्भ हूँ

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥

भगवद्गीता 14.3

अर्थ

महान प्रकृति मेरा गर्भ है। उसमें मैं बीज रखता हूँ। उसी से सब प्राणी जन्म लेते हैं।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

श्रीकृष्ण सृष्टि को समझाने के लिए गर्भावस्था को ही उदाहरण बनाते हैं। आपका शरीर इस समय जो कर रहा है, यह श्लोक उसका सम्मान करता है।

इससे क्या मिल सकता है

गर्भावस्था को लेकर गरिमा और अचरज का एहसास, जो थकान के दिनों में या अपने शरीर को लेकर चिंता होने पर मदद करता है।

यह भी देखें: गर्भावस्था के लिए गीता के श्लोक

पिता के लिए एक श्लोक

बीज देने वाले पिता

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥

भगवद्गीता 14.4

अर्थ

किसी भी गर्भ से जन्म लेने वाले हर रूप के लिए प्रकृति माँ है, और मैं बीज देने वाला पिता हूँ।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

पिता के पढ़ने के लिए एक सुंदर श्लोक। इसमें माता-पिता दोनों को पावन साथी के रूप में देखा गया है।

इससे क्या मिल सकता है

यह पिता को बिल्कुल शुरुआत से ही साथ जुड़ने का न्योता देता है।

कौन जप सकता है
पिता (माँ के साथ)

यह भी देखें: गर्भावस्था के लिए गीता के श्लोक

संतान की आस में प्रार्थना

संतान गोपाल मंत्र

देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥

संतान गोपाल स्तोत्र (भक्ति-पाठ; मंदिरों में लोकप्रिय श्लोक)

अर्थ

हे कृष्ण, देवकीनंदन, गोविंद, जगत के स्वामी! मुझे संतान का आशीर्वाद दीजिए। मैं आपकी शरण में हूँ।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

संतान चाहने वाले दंपती के लिए यह सबसे ज़्यादा प्रचलित प्रार्थनाओं में से एक है। पुराने ग्रंथों में ‘तनय’ का अर्थ बेटा भी होता है और संतान भी; बहुत-से परिवारों की तरह हम इसे ‘संतान’ के अर्थ में पढ़ते हैं। हर संतान एक आशीर्वाद है।

इससे क्या मिल सकता है

गर्भधारण की कोशिश के दिनों में सुकून और उम्मीद। अगर गर्भ ठहरने में समय लग रहा है, तो कृपया किसी प्रजनन विशेषज्ञ डॉक्टर से भी मिलें।

यह भी देखें: संतान गोपाल मंत्र: अर्थ और जपने की विधि