कथा: सुनाने वाली कहानियाँ
अर्जुन के काँपते हाथ
पुरानी कथा, नए शब्दों में · लगभग 3 मिनट · 35वाँ सप्ताह
एक बहुत बड़े दिन से पहले, कृष्ण अपने दोस्त अर्जुन का मन शांत करते हैं।
हेलो, नन्ही जान। मैं मम्मा हूँ। आज तुम्हारे लिए एक कहानी है।
बहुत पहले की बात है। एक सुबह आसमान गुलाबी और सुनहरा हो रहा था।
अर्जुन एक बड़े, खुले मैदान के किनारे खड़े थे। वो ताकतवर थे, अच्छे थे, हिम्मत वाले थे। पर आज वो खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहे थे।
आज एक बहुत बड़ा दिन था। इस दिन की तैयारी वो बहुत, बहुत समय से कर रहे थे। और अब जब वो दिन आ गया था, तो उनका मन भारी हो गया था।
उनके हाथ काँपने लगे। मुँह सूखने लगा। मन में खयाल ऐसे उड़ रहे थे, जैसे चिड़ियाँ इधर से उधर फुदक रही हों।
"कृष्ण," उन्होंने धीरे से कहा, "मुझसे नहीं होगा। मेरे हाथ काँप रहे हैं। मेरा मन एक पल भी नहीं ठहर रहा।"
कृष्ण अर्जुन के सबसे प्यारे दोस्त थे। वो पास आकर खड़े हो गए। अर्जुन के कंधे पर अपना गरम हाथ रखा। उनकी आँखें शांत थीं, प्यार भरी, जैसे कोई ठहरी हुई झील।
"मैं यहीं हूँ," कृष्ण बोले। "मन को स्थिर रखो, मेरे दोस्त। अंदर से शांत रहो।"
अर्जुन ने एक साँस ली। "पर कैसे?" उन्होंने पूछा। "ऐसे दिन मन शांत कैसे रहे?"
कृष्ण मुस्कुराए। "कभी कछुए को देखा है?"
अर्जुन ने हाँ में सिर हिलाया।
"जब कछुए को आराम करना होता है," कृष्ण बोले, "तो वो धीरे से अपना सिर और पैर अंदर कर लेता है। आराम से अपने खोल में चला जाता है। ना कोई जल्दी, ना कोई फ़िक्र। बस अंदर जाकर चुपचाप रहता है।"
"तुम्हारा मन भी ऐसा कर सकता है," कृष्ण ने कहा। "जब बाहर का शोर बहुत ज़्यादा हो, तो धीरे से अपने अंदर चले जाओ। अपनी शांत जगह में आराम करो। मन को स्थिर रखो, मेरे दोस्त। अंदर से शांत रहो।"
अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं। धीरे से साँस अंदर ली। धीरे से साँस बाहर छोड़ी। मन की फुदकती चिड़ियाँ धीरे-धीरे शांत होकर बैठने लगीं।
कृष्ण फिर धीरे से बोले, "अब समंदर के बारे में सोचो। कितनी सारी नदियाँ उसमें आकर मिलती हैं, दिन-रात। बड़ी नदियाँ, छोटी नदियाँ, तेज़ नदियाँ। सब उसी में आकर समा जाती हैं।"
"तो क्या समंदर उछल पड़ता है? क्या वो किनारों से बाहर छलक जाता है?"
"नहीं," अर्जुन ने धीरे से कहा। "समंदर शांत रहता है।"
"हाँ," कृष्ण बोले। "वो इतना गहरा है, इसलिए शांत रहता है। खयाल और एहसास भी मन में ऐसे ही आएँगे, नदियों की तरह। उन्हें आने दो। अपने मन को समंदर की तरह गहरा बना लो। मन को स्थिर रखो, मेरे दोस्त। अंदर से शांत रहो।"
अर्जुन ने आँखें खोलीं। अब सूरज निकल रहा था, गरम और सुनहरा। मैदान पर ठंडी हवा चल रही थी। कहीं दूर एक चिड़िया गाने लगी।
उन्होंने अपने हाथ देखे। हाथ अब नहीं काँप रहे थे। दिल की धड़कन धीमी और मज़बूत थी।
"अब मेरा मन स्थिर है," अर्जुन बोले। "शुक्रिया, मेरे दोस्त।"
कृष्ण मुस्कुराए। "मैं हमेशा तुम्हारे साथ था," वो बोले। "और हमेशा रहूँगा।"
अर्जुन सीधे खड़े हो गए। बड़ा दिन अब भी बड़ा था। पर अब उनका मन शांत था, गहरे नीले समंदर जैसा। और वो पूरी तरह तैयार थे।
“शांत और मज़बूत मन बड़े काम कर सकता है।”
गर्भ संवाद
कृष्ण ने अर्जुन का मन गहरे, शांत समंदर जैसा कर दिया। शांत मन से हम बड़े काम कर सकते हैं। हमारे बड़े दिन पर भी, हम साथ मिलकर शांत रहेंगे।
इसे धीरे-धीरे बोलकर सुनाइए, चाहें तो अपने शब्दों में।
मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, नन्ही जान। तुम सुरक्षित हो। हम साथ हैं।
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