कथा: सुनाने वाली कहानियाँ
यशोदा माँ की रस्सी
पुरानी कथा, नए शब्दों में · लगभग 3 मिनट · 36वाँ सप्ताह
यशोदा माँ की रस्सी दो उँगल छोटी पड़ती रही, फिर प्यार ने कान्हा को बाँधा।
हेलो, नन्ही जान। मैं मम्मा हूँ। आज तुम्हारे लिए एक कहानी है।
बहुत पहले की बात है। गोकुल गाँव में सुबह की प्यारी-प्यारी आवाज़ें आ रही थीं।
घर्र, घर्र... यशोदा माँ की मटकी में मथानी चल रही थी। बाहर गायें रंभा रही थीं। और पूरे घर में छोटे कान्हा के पैर दौड़ रहे थे, छम, छम, छम।
कान्हा की उँगलियों पर माखन लगा था। नाक पर भी माखन लगा था। वो खिलखिला रहे थे, और खिड़की पर बैठे बंदरों को माखन बाँट रहे थे।
यशोदा माँ ने कमर पर हाथ रखे। फिर मुस्कुरा दीं। अपने कान्हा से वो कभी नाराज़ रह ही नहीं पाती थीं।
"कान्हा," वो हँसकर बोलीं, "तू तो सारे घर में दौड़ रहा है! चल, एक खेल खेलते हैं। मैं तुझे इस बड़ी ओखली से बाँध देती हूँ। फिर तू थोड़ी देर एक जगह बैठेगा।"
कान्हा खिलखिलाए। "बाँधो तो, मैया!"
यशोदा माँ एक नरम रस्सी लाईं। कान्हा के गोल-मटोल पेट के चारों ओर लपेटी। पर अरे! रस्सी के सिरे मिले ही नहीं। रस्सी दो उँगल छोटी रह गई।
"दो उँगल छोटी!" वो हँसीं। "बस दो उँगल छोटी!"
वो एक और रस्सी लाईं और उसे जोड़ दिया। अब रस्सी लंबी हो गई। फिर से कान्हा के चारों ओर लपेटी। और फिर से सिरे नहीं मिले।
"दो उँगल छोटी!" यशोदा माँ ने आँखें बड़ी करके कहा। "बस दो उँगल छोटी!"
उन्होंने पड़ोस की माँओं को आवाज़ दी। "अपनी रस्सियाँ ले आओ!" सब तरह-तरह की रस्सियाँ लेकर आ गईं। लंबी रस्सियाँ, मोटी रस्सियाँ, गायों की रस्सियाँ, कुएँ की रस्सियाँ। यशोदा माँ ने सबको आपस में जोड़ दिया। रस्सी लंबी, और लंबी होती गई। फ़र्श पर ऐसे बिछ गई, जैसे कोई लंबी, आलसी नदी।
उन्होंने फिर अपने नन्हे कान्हा के चारों ओर रस्सी लपेटी। सब झुककर देखने लगे।
"दो उँगल छोटी!" सब हँस पड़े। "बस दो उँगल छोटी!"
कान्हा की आँखें चमक रही थीं। हँसी के मारे उनका पेट हिल रहा था। जितनी रस्सी आती, खेल उतना ही लंबा होता जाता।
यशोदा माँ भी हँस रही थीं। पर अब उनके बाल खुलने लगे थे। माथे पर पसीने की छोटी-छोटी बूँदें आ गई थीं। इतनी रस्सी लपेटते-लपेटते बाँहें थक गई थीं। फिर भी वो पूरे प्यार से कोशिश करती रहीं।
कान्हा ने माँ का चेहरा देखा। देखा कि माँ कितनी कोशिश कर रही हैं। देखा कि माँ उन्हें कितना प्यार करती हैं।
और कान्हा धीरे से मुस्कुरा दिए।
इस बार जब यशोदा माँ ने रस्सी लपेटी... तो सिरे मिल गए! अब दो उँगल भी छोटी नहीं।
पूरा घर एक पल को चुप हो गया। फिर सबने तालियाँ बजाईं।
कान्हा की मुस्कान जैसे कह रही थी, "मैया, कोई रस्सी मुझे नहीं बाँध सकती। पर तुम्हारा प्यार बाँध सकता है।"
यशोदा माँ ने एक छोटी, नरम-सी गाँठ बाँधी। फिर अपने मुस्कुराते कान्हा को देखा, और उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने कान्हा को रस्सी समेत गोद में उठा लिया, और कसकर गले से लगा लिया। माखन लगे गालों को चूम लिया।
कान्हा ने अपनी छोटी-छोटी बाँहें माँ के गले में डाल दीं। और यही थी सबसे पक्की गाँठ: माँ की प्यार भरी झप्पी।
बाहर गायें रंभा रही थीं। धूप गुनगुनी थी। और यशोदा माँ की बाँहों में नन्हे कान्हा ठीक वहीं थे, जहाँ वो रहना चाहते थे।
“प्यार किसी भी रस्सी से ज़्यादा मज़बूत है।”
गर्भ संवाद
कान्हा को कोई रस्सी नहीं बाँध पाई, पर प्यार ने बाँध लिया। प्यार हमें हमेशा साथ बाँधे रखेगा। मेरी बाँहें तुम्हें गले लगाने का इंतज़ार कर रही हैं।
इसे धीरे-धीरे बोलकर सुनाइए, चाहें तो अपने शब्दों में।
मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, नन्ही जान। तुम सुरक्षित हो। हम साथ हैं।
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