शांति: सुकून भरी कहानियाँ
बाँस और हवा
नई कहानी · लगभग 3 मिनट · 23वाँ सप्ताह
हवा वाली रात में बाँस झुकते-झूमते हैं, और सुबह फिर तनकर खड़े होते हैं।
हेलो, नन्ही जान। मैं मम्मा हूँ। आज तुम्हारे लिए एक कहानी है।
रात का समय है। हम बाँस के झुरमुट के किनारे, लकड़ी के एक छोटे-से घर में हैं। हमारा कंबल नरम है। कोने में एक छोटा-सा दीया जल रहा है।
बाहर हवा तेज़ होती जा रही है। सूँ... सूँ... वह खिड़की खड़खड़ाती है। पेड़ों के बीच से सीटी बजाती निकलती है।
चलो, यहीं से सुनते हैं, गर्माहट में, सुरक्षित...
बाँस पास-पास खड़े हैं, लंबे और पतले। जब हवा आती है, तो बाँस उसके आगे अकड़ते नहीं। वे झुक जाते हैं। नीचे तक झुकते हैं... और हवा को निकल जाने देते हैं।
झुकते हैं, झूमते हैं... झुकते हैं, झूमते हैं... पर टूटते नहीं।
टक... टक... टक... बाँस के तने आपस में धीरे से टकराते हैं। सर्र... सर्र... लंबी पत्तियाँ सरसराती हैं। लगता है जैसे पूरा झुरमुट फुसफुसाकर बात कर रहा हो। "हम यहीं हैं। हम साथ हैं। थामे रहो।"
ज़मीन के नीचे उनकी जड़ें एक-दूसरे का हाथ थामे हैं। वे धरती में गहरे तक जुड़ी हुई हैं। इसलिए ऊपर से बाँस कितना भी झुकें, जड़ें मज़बूत रहती हैं।
हवा और ज़ोर से चलती है। हू-ऊ-ऊ... बाँस झुककर लगभग घास को छूने लगते हैं। एक पल के लिए मन में आता है, बाँस ठीक तो रहेंगे न?
चलो, साँस अंदर लेते हैं... और बाहर छोड़ते हैं... धीरे से... हम अंदर हैं। हम गर्माहट में हैं। और बाँस अच्छी तरह जानते हैं कि क्या करना है।
झुकते हैं, झूमते हैं... झुकते हैं, झूमते हैं... पर टूटते नहीं।
घंटे बीतते हैं। धीरे-धीरे हवा थक जाती है। सूँ... सूँ... श्श... वह हल्की, और हल्की होती जाती है। फिर बस एक धीमी हवा रह जाती है। फिर सब शांत।
हम सो जाते हैं।
सुबह हम दरवाज़ा खोलते हैं। हवा ताज़ी और ठंडी है। हर पत्ते पर नन्ही बूँदें चमक रही हैं। एक डाल पर चिड़िया गा रही है। चीं-चीं... चीं-चीं...
और बाँस? वे फिर से तनकर खड़े हैं। सीधे और हरे, आसमान की ओर बढ़ते हुए। ज़मीन पर कुछ पत्तियाँ बिखरी हैं। पर पूरा झुरमुट सही-सलामत है, और धूप में मुस्कुरा रहा है।
झुकते हैं, झूमते हैं... झुकते हैं, झूमते हैं... पर टूटते नहीं।
नन्ही जान, कुछ दिन हवा वाली रात जैसे होते हैं। ऐसे दिनों में हमें अकड़कर खड़े रहने की ज़रूरत नहीं। हम थोड़ा झुक सकते हैं। झूम सकते हैं। आराम कर सकते हैं, साँस ले सकते हैं, एक-दूसरे को थामे रह सकते हैं।
और जब सुबह आएगी, हम फिर से तनकर खड़े होंगे। बाँस की तरह। साथ-साथ।
चलो, सुबह की ताज़ी हवा में साँस अंदर लेते हैं... और बाहर छोड़ते हैं... बाँस की तरह, नरम भी और मज़बूत भी।
“झुकना टूटना नहीं है।”
गर्भ संवाद
बाँस रात भर झुका रहा, और सुबह फिर तनकर खड़ा हो गया। हम झुकेंगे, पर टूटेंगे नहीं। हर तेज़ हवा में भी, मैं तुम्हें पास थामे रहूँगी।
इसे धीरे-धीरे बोलकर सुनाइए, चाहें तो अपने शब्दों में।
मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, नन्ही जान। तुम सुरक्षित हो। हम साथ हैं।
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