गर्भ संवाद: शिशु से बातें
दबे पाँव चलने वाला हाथी
नई कहानी · लगभग 3 मिनट · 25वाँ सप्ताह
बड़ा हाथी सोती नन्ही चुहिया के पास से दबे पाँव निकलने की कोशिश करता है।
हेलो, नन्ही जान। मैं पापा हूँ। आज तुम्हारे लिए एक कहानी है।
एक हरे-भरे मैदान में, बड़े से नीम के पेड़ के नीचे, एक नन्ही चुहिया चीकू गहरी नींद में सो रही थी। वो एक मुलायम पत्ते पर गोल-मोल होकर लेटी थी। सपने में उसकी छोटी सी नाक सूँ... सूँ... कर रही थी।
तभी वहाँ आया गज्जू हाथी। धम! धम! धम! ज़मीन हिलने लगी, डगमग, डगमग।
गज्जू ठंडे पानी में नहाने तालाब जा रहा था। पर चीकू ठीक उसके रास्ते में सो रही थी।
वो रुक गया। सूँड़ ऊपर उठाई। "ओहो," उसने अपनी भारी, गड़गड़ाती आवाज़ में फुसफुसाकर कहा। "चीकू सो रही है। मुझे बहुत, बहुत चुपचाप जाना होगा।"
उसने गहरी साँस ली। "दबे पाँव, गज्जू, दबे पाँव। रुई जैसे हल्के।"
उसने एक बड़ा पैर उठाया। अब वो तीन पैरों पर खड़ा था। डगमग, डगमग! कभी बाएँ झुका, कभी दाएँ। उसके कान दो बड़े पंखों जैसे फड़फड़ाए। फड़, फड़!
उसने धीरे से पैर नीचे रखा। टिप। एकदम हल्के से। चीकू नहीं जागी। "ही ही," गज्जू अपनी सूँड़ में खिलखिलाया। "काम बन रहा है!"
"दबे पाँव, गज्जू, दबे पाँव। रुई जैसे हल्के।"
उसने अगला पैर उठाया। पर घास का एक तिनका उसके पैर में गुदगुदी करने लगा। गुदगुद, गुदगुद! "हू... हू... ही..." गज्जू ने हँसी रोकने की बहुत कोशिश की। हँसी से उसका पूरा बदन हिलने लगा। सूँड़ स्प्रिंग जैसी गोल मुड़ गई।
फिर एक छोटा सा सफ़ेद फूल उड़ता हुआ उसकी नाक के पास आया। अरे रे! "आ... आ..."
उसने सूँड़ हिलाई। आँखें कसकर मींचीं। और निकली दुनिया की सबसे छोटी, सबसे पतली छींक। "छीं!"
डगमग, डगमग, धप्प! गज्जू सीधा मुलायम घास पर बैठ गया। कान नीचे लटक गए। आँखें गोल-गोल हो गईं।
चीकू ने एक आँख खोली। फिर दूसरी। सामने एक बड़ा सा हाथी घास पर बैठा था, बड़ा हैरान सा।
"ही ही ही!" चीकू चूँ-चूँ करके हँसी। "ही ही! कितना मज़ेदार तरीका जगाने का!"
गज्जू भी हँस पड़ा। "हो हो हो! मैं दबे पाँव चलने की कोशिश कर रहा था। माफ़ करना चीकू, मैंने तुम्हें जगा दिया।"
"इतने मज़े से तो मैं पहले कभी नहीं जागी," चीकू बोली। "एक बार फिर करो ना!"
तो गज्जू उठा। और दोनों मिलकर, बहुत धीरे-धीरे, दबे पाँव तालाब तक गए। "दबे पाँव, दबे पाँव..." बड़े-बड़े पैर और नन्हे-नन्हे पैर, साथ-साथ।
तालाब का पानी ठंडा और शांत था। गज्जू ने सूँड़ से चीकू पर हल्की सी फुहार डाली। छिड़, छिड़!
फिर चीकू उसके बड़े, मुलायम कान पर गोल-मोल होकर फिर से सो गई। और गज्जू एक पहाड़ की तरह शांत खड़ा रहा... ज़रा भी नहीं हिला।
“बड़े हो या छोटे, नरमी से पेश आओ।”
गर्भ संवाद
गज्जू बहुत बड़ा था, और बहुत नरम दिल भी। सबसे प्यार और नरमी से पेश आना। तुम्हारी नींद के वक़्त मैं भी दबे पाँव चलूँगा।
इसे धीरे-धीरे बोलकर सुनाइए, चाहें तो अपने शब्दों में।
मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, नन्ही जान। तुम सुरक्षित हो। हम साथ हैं।
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