शांति: सुकून भरी कहानियाँ
पहाड़ों वाली रात की ट्रेन
नई कहानी · लगभग 3 मिनट · 13वाँ सप्ताह
रात की स्लीपर ट्रेन हमें धीरे-धीरे झुलाते हुए ठंडे, हरे पहाड़ों तक ले जाती है।
हेलो, नन्ही जान। मैं मम्मा हूँ। आज तुम्हारे लिए एक कहानी है।
रात ठंडी है। हम एक लंबी नीली ट्रेन में हैं। ये ट्रेन पहाड़ों की ओर जा रही है।
हमारी बर्थ नरम और आरामदायक है। एक पतला कंबल है और एक छोटा सा सफ़ेद तकिया। ऊपर एक नन्ही नीली नाइट-लाइट जल रही है। हम खिड़की का पर्दा थोड़ा सा खोल देते हैं।
बाहर शहर की रोशनियाँ पीछे छूट रही हैं। एक... दो... तीन... और फिर सब ग़ायब। अब बस अँधेरे खेत हैं और एक बड़ा, चमकता चाँद।
छुक-छुक... छुक-छुक... ट्रेन हमें धीरे-धीरे झुला रही है।
पहले तो मन थोड़ा भागता रहता है। वो दिन की बातें सोचता है। कल की बातें सोचता है। कोई बात नहीं। हम बस ट्रेन की आवाज़ सुनते हैं। उसकी आवाज़ धीमी है, एक जैसी है, जैसे दिल की धड़कन।
थोड़ी देर में ट्रेन धीमी होती है। एक छोटा सा स्टेशन आता है। वहाँ एक पीली लालटेन जल रही है। एक ऊँघता हुआ गार्ड हरी बत्ती हिलाता है। बेंच पर एक कुत्ता गोल-मोल होकर गहरी नींद में सोया है। ट्रेन पल भर रुकती है... फिर आगे बढ़ जाती है।
हम एक चौड़ी नदी के ऊपर से गुज़रते हैं। पानी पर चाँदनी चाँदी के रिबन जैसी चमक रही है। फिर एक सोता हुआ गाँव आता है। बस एक खिड़की में अब भी रोशनी है।
छुक-छुक... छुक-छुक... ट्रेन हमें धीरे-धीरे झुला रही है।
अब ट्रेन धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगती है। हवा और ठंडी हो जाती है। हम कंबल को ठोड़ी तक खींच लेते हैं। वो नरम है, गरम है।
फिर आती है एक सुरंग। पल भर के लिए सब अँधेरा हो जाता है। ट्रेन की आवाज़ गोल और गहरी हो जाती है। हूऊऊ... हम शांत रहते हैं। हमें पता है कि रोशनी आने वाली है। और हाँ... हम बाहर निकल आते हैं, फिर से नरम चाँदनी में।
पटरियों के किनारे ऊँचे-ऊँचे चीड़ के पेड़ खड़े हैं। वो रात की हवा में झूम रहे हैं। पहाड़ अँधेरे और शांत हैं। उन पर छोटी-छोटी रोशनियाँ टिमटिमा रही हैं, जैसे तारे पहाड़ों पर आराम करने उतर आए हों।
एक और स्टेशन। ये तो बहुत ही छोटा है। एक चाय वाला अपनी दुकान के पास सो रहा है। एक घंटी धीरे से एक बार बजती है। टन... फिर ट्रेन आगे चल पड़ती है।
अब हमारा शरीर भारी और ढीला-सा लग रहा है। साँस धीमी है। अंदर... और बाहर। ट्रेन बाईं ओर झूलती है... फिर दाईं ओर। बाएँ... और दाएँ। बिल्कुल पालने की तरह।
सुबह हम हरे-भरे पहाड़ों में जागेंगे। वहाँ ठंडी हवा होगी और साफ़ नीला आसमान। पर अभी... बस आराम।
छुक-छुक... छुक-छुक... ट्रेन हमें धीरे-धीरे झुला रही है। और हम सो जाते हैं।
“हर सफ़र आराम से भी हो सकता है।”
गर्भ संवाद
रात की ट्रेन हमें धीरे-धीरे झुलाते हुए पहाड़ों तक ले गई। मेरे साथ धीरे-धीरे झूलो, नन्ही जान। पूरी रात हम साथ हैं, सुरक्षित और आराम से।
इसे धीरे-धीरे बोलकर सुनाइए, चाहें तो अपने शब्दों में।
मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, नन्ही जान। तुम सुरक्षित हो। हम साथ हैं।
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