कथा: सुनाने वाली कहानियाँ
कछुआ, जो कभी देर से नहीं पहुँचा
नई कहानी · लगभग 3 मिनट · 8वाँ सप्ताह
एक धीमा, शांत कछुआ जंगल के तीन मेलों में ठीक समय पर पहुँचता है।
हेलो, नन्ही जान। मैं मम्मा हूँ। आज तुम्हारे लिए एक कहानी है।
एक हरे-भरे जंगल में धीरू नाम का एक कछुआ रहता था। वो धीरे चलता था। बहुत धीरे। पर धीरू कभी देर से नहीं पहुँचता था।
उसका दोस्त चीकू खरगोश बहुत तेज़ था। फुर्र! सर्र! चीकू हमेशा जल्दी में रहता था।
बसंत आया, तो पहाड़ी पर पतंग का मेला लगा। धीरू सुबह-सुबह ही निकल पड़ा। उसने कोई जल्दी नहीं की। रास्ते में उसने पीले फूल देखे। चिड़ियों का गाना सुना।
कदम, कदम, कदम। ठीक समय पर।
चीकू थोड़ी देर और सोता रहा। फिर उछलकर उठा और भाग पड़ा। वो इतनी तेज़ भागा कि गलत रास्ते पर चला गया। फिर उसे वापस भागना पड़ा।
जब पहली पतंग आसमान में उड़ी, धीरू वहाँ पहुँच चुका था, शांत और खुश। तभी चीकू हाँफता हुआ दौड़ता आया। वो घास पर धम्म से लेट गया और हँस पड़ा। "धीरू, तुम फिर से पहले!"
फिर बारिश का मौसम आया, और नदी किनारे झूलों का मेला लगा। धीरू जल्दी निकल पड़ा। बारिश की बूँदें उसकी पीठ पर टप-टप गिर रही थीं। उसे वो आवाज़ बड़ी अच्छी लगी।
कदम, कदम, कदम। ठीक समय पर।
चीकू आख़िरी पल तक एक बड़े पत्ते के नीचे बैठा रहा। फिर तेज़ी से निकला। छपाक! छपाक! वो हर गड्ढे के ऊपर से कूदता गया।
जब पुराने बरगद पर पहला झूला ऊपर गया, धीरू वहाँ था। चीकू भीगा हुआ, थका हुआ आया। उसने पानी झटका और हँस पड़ा। "ये तुम कैसे कर लेते हो?"
फिर शरद आया, और मैदान में दीयों का मेला लगा। धीरू हमेशा की तरह जल्दी निकल पड़ा। झींगुर धीरे-धीरे गा रहे थे। जुगनू घास में टिमटिमा रहे थे।
कदम, कदम, कदम। ठीक समय पर।
चीकू कभी यहाँ, कभी वहाँ, बस काम में लगा रहा। फिर उसने देखा कि सूरज ढल रहा है। वो पहले से भी तेज़ भागा!
जब पहला दीया जला, धीरू वहाँ था। फिर चीकू लुढ़कता-पुढ़कता, हाँफता हुआ पहुँचा। उसने धीरू को देखा और हँस पड़ा।
"धीरू, तुम इतने धीरे चलते हो," चीकू बोला। "फिर भी कभी देर नहीं होती। इसका राज़ क्या है?"
धीरू मुस्कुराया। "मैं जल्दी निकलता हूँ, और अपनी रफ़्तार से चलता हूँ। धीरे चलना ही मेरी सही रफ़्तार है।"
चीकू अपने दोस्त के पास बैठ गया। दोनों साथ मिलकर जगमगाते दीये देखते रहे। ठंडी हवा चल रही थी। ऊपर आसमान में तारे एक-एक करके निकल आए, बिलकुल ठीक समय पर।
“अपनी रफ़्तार ही सही रफ़्तार है।”
गर्भ संवाद
धीरू अपनी रफ़्तार से चला, और हमेशा ठीक समय पर पहुँचा। हम अपनी रफ़्तार से चलेंगे, तुम और मैं। कोई जल्दी नहीं है, नन्ही जान। हमारे पास पूरा समय है।
इसे धीरे-धीरे बोलकर सुनाइए, चाहें तो अपने शब्दों में।
मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, नन्ही जान। तुम सुरक्षित हो। हम साथ हैं।
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