कथा: सुनाने वाली कहानियाँ
गिलहरी और राम सेतु
पुरानी कथा, नए शब्दों में · लगभग 3 मिनट · 7वाँ सप्ताह
नन्ही गिलहरी रेत के दानों से राम जी का पुल बनाने में मदद करती है।
हेलो, नन्ही जान। मैं मम्मा हूँ। आज तुम्हारे लिए एक कहानी है।
बहुत समय पहले, नीले समुंदर के किनारे एक नन्ही गिलहरी रहती थी। उसकी पूँछ झबरीली थी और आँखें चमकीली।
एक सुबह उसे किनारे से ज़ोर-ज़ोर की आवाज़ें सुनाई दीं। धप! छपाक! धप! छपाक! वो दौड़कर देखने गई कि क्या हो रहा है।
वहाँ राम जी के साथी समुंदर पर पुल बना रहे थे। बड़े-बड़े भालू और ताकतवर बंदर भारी पत्थर उठा रहे थे। वो एक-एक करके पत्थर पानी में रख रहे थे। इसी पुल से राम जी को सीता माँ को घर वापस लाना था।
नन्ही गिलहरी बड़ी-बड़ी आँखों से सब देखती रही। उसने सोचा, "मैं भी मदद करना चाहती हूँ। पर मैं तो पत्थर उठा नहीं सकती। फिर मैं क्या करूँ?"
तभी उसे एक तरकीब सूझी। वो दौड़कर पानी में गई और डुबकी लगाई। फिर नरम रेत में लोट गई। गीले बालों पर रेत चिपक गई। वो भागकर पुल तक गई, और पत्थरों के बीच रेत झाड़ दी।
डुबकी, लोट-पोट, दौड़ और झाड़। सारा दिन वो ऐसे ही आती-जाती रही।
एक प्यारा-सा बंदर झुककर उसे देखने लगा। "नन्ही दोस्त, ये क्या कर रही हो?" उसने पूछा।
"मैं भी पुल बनाने में मदद कर रही हूँ," गिलहरी बोली।
बंदर पहले तो हैरान हुआ। फिर मुस्कुरा दिया।
राम जी ने भी उसे देखा। उनके चेहरे पर हमेशा की तरह प्यारी-सी मुस्कान थी। वो रेत पर बैठ गए और अपना हाथ आगे बढ़ाया। गिलहरी उछलकर उनकी गर्म हथेली पर चढ़ गई।
"देखो," राम जी ने अपने साथियों से कहा। "बड़े पत्थर पुल को मज़बूत बनाते हैं। पर ये छोटी-सी रेत पत्थरों के बीच की खाली जगह भरती है। हर छोटी मदद एक तोहफ़ा है।"
फिर राम जी ने अपनी तीन उँगलियों से उसकी पीठ को प्यार से सहलाया। धीरे से, नरमी से, प्यार से। जहाँ-जहाँ उनकी उँगलियाँ लगीं, वहाँ तीन धारियाँ बन गईं।
कहते हैं, इसीलिए गिलहरी की पीठ पर तीन धारियाँ होती हैं। ये राम जी की प्यार भरी छुअन की निशानी है।
गिलहरी खुशी से भरकर नीचे कूद गई। समुंदर की ठंडी हवा चल रही थी। लहरें किनारे पर छप-छप कर रही थीं।
डुबकी, लोट-पोट, दौड़ और झाड़। और नन्ही गिलहरी खुशी-खुशी फिर से अपने काम में लग गई, पीठ पर तीन प्यारी धारियाँ लिए।
“प्यार से किया छोटा काम भी बड़ा होता है।”
गर्भ संवाद
नन्ही गिलहरी ने पूरे दिल से मदद की। छोटी-छोटी कोशिशें भी बड़े तोहफ़े होती हैं। तुम्हारा हर दिन थोड़ा-थोड़ा बढ़ना, मेरे लिए सबसे बड़ा तोहफ़ा है।
इसे धीरे-धीरे बोलकर सुनाइए, चाहें तो अपने शब्दों में।
मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, नन्ही जान। तुम सुरक्षित हो। हम साथ हैं।
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मीरा का इंतज़ार
यहाँ हर कहानी प्यार से, शांति से ख़त्म होती है। डराने वाले या दुखी अंत हम नहीं रखते, और पुरानी कथाएँ आसान शब्दों में सुनाते हैं।
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