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अर्थ सहित श्लोक

प्रेगनेंसी में गायत्री मंत्र

ऋग्वेद (3.62.10) का गायत्री मंत्र भारत की सबसे आदरणीय प्रार्थनाओं में से एक है। इसमें सूर्य के दिव्य प्रकाश से विनती है कि वह हमारी बुद्धि को राह दिखाए। गर्भ संस्कार में बहुत-से परिवार यही मंत्र चुनते हैं, और माँओं के मन में अक्सर सवाल होता है कि क्या प्रेगनेंसी में इसे जपना ठीक है। बहुत-सी महिलाएँ हर तिमाही में इसका जप करती हैं। कुछ परंपराओं में इसे कौन जप सकता है, इसके नियम हैं। अगर आपके घर में ऐसा कोई नियम है, तो रिकॉर्डिंग सुन लीजिए, या किसी अपने या घर के किसी बड़े से जपने को कहिए और ख़ुद पास बैठकर सुनिए।

मंत्र को धीरे-धीरे 11 या 21 बार जपिए। शाम का समय इसके लिए बहुत अच्छा है — शांत कमरा, पेट पर हाथ, और कुछ पल सिर्फ़ आपके और आपके शिशु के। हर पंक्ति सहज साँस के साथ बोलिए। पंक्ति पूरी करने के लिए साँस कभी न रोकिए, और चक्कर आए या साँस फूले, तो रुक जाइए। शोध में देखा गया है कि लगभग 19वें सप्ताह से शिशु आवाज़ पर प्रतिक्रिया देने लग सकते हैं, और नवजात शिशु किसी और महिला की आवाज़ के मुक़ाबले अपनी माँ की आवाज़ ज़्यादा पसंद करते हैं। इसलिए आप जो भी जपें, आपकी अपनी आवाज़ शिशु के लिए एक प्यारी सौगात है।

इंटरनेट पर ऐसे दावे मिलेंगे कि गायत्री मंत्र से शिशु ज़्यादा बुद्धिमान होता है। हम ऐसा वादा नहीं कर सकते, और न ही कोई मंत्र कर सकता है। बहुत-सी माँएँ इससे जो पाती हैं, वह सीधी-सी बात है: भागदौड़ भरे दिन में कुछ शांत, ठहरे हुए पल। अगर आपकी गर्भावस्था हाई-रिस्क है, तो साँस का कोई भी अभ्यास शुरू करने से पहले डॉक्टर से पूछ लीजिए। ज़रूरी सूचना पढ़ें

इसे कैसे जपें

सबसे अच्छा समय
शाम को, शांत कमरे में, पेट पर हाथ रखकर
जपने का तरीका
11 या 21 बार, धीरे-धीरे
कौन जप सकता है
माँ, पिता, बड़े भाई-बहन
सबसे सही सप्ताह
18–28 सप्ताह

सच कहें तोकुछ परंपराओं में इसे हर कोई नहीं जप सकता; पर सुन सभी सकते हैं।

तेज़ बुद्धि

गायत्री मंत्र

ॐ भूर्भुवः स्वः ।तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

ऋग्वेद 3.62.10

अर्थ

हम दिव्य सूर्य के उज्ज्वल प्रकाश का ध्यान करते हैं। वह हमारी बुद्धि को प्रेरणा दे।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

सबसे आदरणीय वैदिक प्रार्थनाओं में से एक, साफ़ और तेज़ बुद्धि के लिए। गर्भ संस्कार में कई परिवार इसी को चुनते हैं।

इससे क्या मिल सकता है

एक सधा हुआ, लयबद्ध अभ्यास। धीरे-धीरे जपें, तो यह साँसों को हल्के से एक लय में ले आता है।

विषय: शिशु से जुड़ाव

स्रोत

हम किसी शोध की बस उतनी ही बात करते हैं, जितनी उसमें सच में पाई गई। ज़्यादातर शोध थोड़े-से लोगों पर हुए हैं, और कोई भी शोध आपके डॉक्टर की सलाह की जगह नहीं ले सकता। ज़रूरी सूचना पढ़ें

  • गर्भ में शिशु कब से आवाज़ पर प्रतिक्रिया देने लगता है

    शोध में क्या पता चला
    माँ के पेट पर रखे स्पीकर से आवाज़ सुनाने पर, गर्भ में शिशु सबसे पहले लगभग 19वें सप्ताह में हरकत करते दिखे। 27वें सप्ताह तक लगभग सभी शिशु भारी, नीचे सुर वाली आवाज़ों पर प्रतिक्रिया देने लगे थे।
    यह शोध क्या नहीं बताता
    इसमें सिर्फ़ ‘बीप’ जैसी सादी ध्वनियाँ सुनाई गई थीं — न बोली, न संगीत, न जप। इसलिए यह नहीं बताता कि शिशु शब्द समझते हैं, या श्लोक, कहानी और संगीत सुनने से उन्हें कोई फ़ायदा होता है।

    Hepper & Shahidullah (1994). Development of fetal hearing. Archives of Disease in Childhood - Fetal and Neonatal Edition 71(2):F81-F87.

    शोध का सारांश पढ़ें (अंग्रेज़ी में)पूरा शोध पढ़ें (अंग्रेज़ी में, मुफ़्त)

  • नवजात शिशु माँ की आवाज़ ज़्यादा पसंद करते हैं

    शोध में क्या पता चला
    एक छोटे-से शोध में, कुछ ही दिन के नवजात शिशुओं ने चुसनी चूसने का ढंग बदलकर अपनी माँ की आवाज़ किसी दूसरी महिला की आवाज़ से ज़्यादा बार सुनी। यानी जन्म के पहले दिनों से ही शिशु माँ की आवाज़ को ज़्यादा पसंद करते हैं।
    यह शोध क्या नहीं बताता
    इस शोध में गर्भावस्था के दौरान कुछ नहीं परखा गया। इसलिए यह साबित नहीं करता कि यह पसंद गर्भ में ही बनी। यह भी नहीं दिखाता कि गर्भावस्था में बात करने, पढ़कर सुनाने या जप करने से शिशु ज़्यादा सेहतमंद या होशियार होते हैं, या माँ से उनका जुड़ाव गहरा होता है।

    DeCasper & Fifer (1980). Of human bonding: newborns prefer their mothers' voices. Science 208(4448):1174-1176.

    शोध का सारांश पढ़ें (अंग्रेज़ी में)