गर्भ संवाद यानी गर्भ में पल रहे शिशु से बातें करना। लगभग 19वें सप्ताह से शिशु आवाज़ पर प्रतिक्रिया देने लग सकते हैं, इसलिए गर्भावस्था के बीच के महीनों में शिशु को रोज़ अपनी आवाज़ सुनाने की आदत डालना बहुत प्यारा लगता है। ये श्लोक मानो किसी नन्हे-मुन्ने को सुनाने के लिए ही बने हों: गर्भवती देवकी को देवताओं का ‘डरो मत’ कहना, भागवत की वह कथा जिसमें कहा गया है कि प्रह्लाद ने माँ के गर्भ में रहते हुए ही नारद मुनि का उपदेश सुना था, ‘हम दोनों साथ-साथ सुरक्षित रहें’ वाला शांति मंत्र, और लोरी जैसा मीठा मधुराष्टकम्।
18 से 28 सप्ताह के बीच का समय इन श्लोकों के लिए अच्छा है। कोई एक श्लोक चुनिए और एक हफ़्ते तक रोज़ शाम को, शांत कमरे में, पेट पर हाथ रखकर धीमे स्वर में बोलिए या गाइए। एक ही श्लोक बार-बार दोहराना काफ़ी है। संस्कृत पढ़ने की आदत न हो, तो अर्थ से शुरुआत कीजिए। कोई अपना और शिशु के बड़े भाई-बहन भी साथ जुड़ सकते हैं।
शिशु आपकी आवाज़ की ध्वनि सुनता है, शब्दों का अर्थ नहीं — और इसमें कोई हर्ज नहीं। इससे आपको कुछ शांत पल मिलते हैं, और शिशु से बात करने की आदत भी बन जाती है। नवजात शिशु अक्सर माँ की आवाज़ को ज़्यादा पसंद करते हैं, इसलिए यह आदत जन्म के बाद भी यूँ ही चलती रह सकती है।