कथा: सुनाने वाली कहानियाँ
हनुमान जी को याद आई अपनी ताकत
पुरानी कथा, नए शब्दों में · लगभग 3 मिनट · 27वाँ सप्ताह
जामवंत जी हनुमान जी को ताकत याद दिलाते हैं, और वो समुद्र लाँघ जाते हैं।
हेलो, नन्ही जान। मैं मम्मा हूँ। आज तुम्हारे लिए एक कहानी है।
बहुत पहले की बात है। वानरों और भालुओं की एक बड़ी टोली एक विशाल समुद्र के किनारे पहुँची। वो बहुत लंबा रास्ता तय करके आए थे। वो सीता माता को ढूँढ रहे थे, और राम जी उनकी खबर का इंतज़ार कर रहे थे।
लहरें एक के बाद एक किनारे पर आ रही थीं। छप... छप... समुद्र दूर-दूर तक फैला था, नीला और गहरा। उसके उस पार लंका का द्वीप था।
"इतना बड़ा समुद्र कौन पार करेगा?" वानरों ने पूछा।
एक बोला, "मैं थोड़ी दूर तक कूद सकता हूँ।" दूसरा बोला, "मैं उससे थोड़ा आगे तक।" पर कोई भी पूरा समुद्र पार नहीं कर सकता था।
हनुमान जी एक चट्टान पर चुपचाप बैठे थे। लहरों को देख रहे थे। कुछ बोल नहीं रहे थे। न जाने कैसे, वो भूल गए थे कि उनमें कितनी ताकत है।
तभी बूढ़े और समझदार जामवंत जी आकर उनके पास बैठ गए। उनकी आवाज़ गहरी और प्यार भरी थी, जैसे कोई गरम कंबल।
"हनुमान," उन्होंने धीरे से कहा, "तुम इतने चुप क्यों हो?"
हनुमान जी ने उनकी ओर देखा।
जामवंत जी बोले, "तुम पवनपुत्र हो, हवा की संतान। जब तुम बहुत छोटे थे, तब तुमने उगता हुआ सूरज देखा था। तुम्हें लगा कि वो कोई पका हुआ लाल फल है। और तुम उसे पकड़ने के लिए आसमान में उछल गए थे!"
हनुमान जी की आँखें चमकने लगीं।
"तुम्हारा दिल राम जी के प्यार से भरा है," जामवंत जी बोले। "तुम्हारी बुद्धि तेज़ है। तुम हवा की तरह ताकतवर और फुर्तीले हो। याद करो, हनुमान, तुम कौन हो।"
हनुमान जी ने आँखें बंद कीं। समुद्र की नमकीन हवा में धीरे से साँस ली। और धीरे-धीरे उन्हें सब याद आने लगा। बालों में बहती हवा याद आई। खुला, नीला आसमान याद आया। दिल में बसा प्यार याद आया।
"याद करो, हनुमान, तुम कौन हो," जामवंत जी ने फिर से धीमे से कहा।
हनुमान जी उठकर खड़े हो गए। और वो बड़े होने लगे। ऊँचे... और ऊँचे... और ऊँचे! वो एक पहाड़ जितने ऊँचे हो गए। सारे वानर हैरानी से ऊपर देखने लगे। "जय श्री राम!" सब खुशी से बोल उठे।
हनुमान जी किनारे की एक बड़ी पहाड़ी पर चढ़ गए। उन्होंने हाथ जोड़कर राम जी को याद किया। घुटने मोड़े। और फिर... सर्र्र! वो आसमान में उछल गए।
वो नीली लहरों के ऊपर उड़ते चले गए, जैसे कोई बड़ा सा सुनहरा पंछी। हवा उन्हें प्यार से उठाए ले जा रही थी। धूप उनकी पीठ को गरमाहट दे रही थी। नीचे समुद्र चमक रहा था, नाच रहा था।
आखिर में उन्हें लंका का हरा किनारा दिखा। नीचे, नीचे, और नीचे वो उतरे। एक घास भरी पहाड़ी पर धीरे से पाँव रखे। धप! एकदम सही-सलामत।
हनुमान जी ने मुस्कुराकर समुद्र के उस पार देखा। वो जानते थे कि दूसरे किनारे पर उनके साथी खुशी से उछल रहे होंगे। और बूढ़े जामवंत जी भी मुस्कुरा रहे होंगे।
हनुमान जी ने एक गहरी, खुशी भरी साँस ली। और धीरे से खुद से कहा, "हाँ, मुझे याद है, मैं कौन हूँ।"
“कभी-कभी बस अपनी ताकत याद दिलाने की ज़रूरत होती है।”
गर्भ संवाद
हनुमान जी को बस प्यार से उनकी ताकत याद दिलाने की ज़रूरत थी। हम जितना सोचते हैं, उससे कहीं ज़्यादा मज़बूत हैं। जब भी ज़रूरत हो, नन्ही जान, मैं भी तुम्हें ये याद दिलाऊँगी।
इसे धीरे-धीरे बोलकर सुनाइए, चाहें तो अपने शब्दों में।
मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, नन्ही जान। तुम सुरक्षित हो। हम साथ हैं।
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