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शांति: सुकून भरी कहानियाँ

चाय के बागानों पर धुंध

नई कहानी · लगभग 3 मिनट · 22वाँ सप्ताह

सुबह की ठंडी धुंध चाय के बागानों की हरी कतारों पर धीरे-धीरे छा जाती है।

लगभग 3 मिनटआराम से बैठिए, एक हाथ पेट पर रखिए, और धीरे-धीरे, प्यार से पढ़िए।

हेलो, नन्ही जान। मैं मम्मा हूँ। आज तुम्हारे लिए एक कहानी है।

चाय के बागानों वाले पहाड़ों पर सुबह-सुबह का समय है। हवा ठंडी और ताज़ी है। हम लकड़ी की एक बेंच पर बैठे हैं, गर्म शॉल ओढ़कर। चलो, उसे थोड़ा और पास लपेट लेते हैं... और आराम से बैठ जाते हैं।

चारों ओर पहाड़ हरे-भरे हैं। चाय की झाड़ियों की कतारें ढलानों पर घूमती हुई जाती हैं। वे नरम, हरी सीढ़ियों जैसी लगती हैं, ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे। बीच-बीच में ऊँचे, पतले पेड़ खड़े हैं, जो उन्हें छाँव देते हैं।

नीचे घाटी में कुछ सफ़ेद-सा जाग रहा है। यह धुंध है।

धीरे-धीरे... हौले-हौले... धुंध आगे बढ़ती है।

वह ज़मीन पर उतरे किसी बड़े, चुप बादल जैसी है। उसे कोई जल्दी नहीं है। वह कोई आवाज़ नहीं करती। वह पहाड़ पर ऊपर चढ़ती है, एक-एक कतार करके।

सबसे पहले वह नीचे बहते छोटे-से झरने को ढक लेती है। उसके पानी की आवाज़ अब भी आती है... कल-कल... कल-कल... पर झरना छिप गया है।

फिर वह चाय की सबसे निचली कतार को ढकती है। फिर अगली को। फिर उसके बाद वाली को। हरी पत्तियाँ हल्की और चाँदी जैसी हो जाती हैं।

धीरे-धीरे... हौले-हौले... धुंध आगे बढ़ती है।

एक नन्ही चिड़िया जल्दी-जल्दी चहचहा रही है। चीं-चीं-चीं... चीं-चीं-चीं... धुंध उसके पेड़ तक पहुँचती है। और चिड़िया चुप हो जाती है, जैसे थोड़ी देर और आराम करना चाहती हो।

अब धुंध हमें भी छूती है। गालों पर ठंडी लगती है, जैसे कोई भीगी पंखुड़ी। शॉल पर नन्ही-नन्ही बूँदें बैठ जाती हैं। चलो, ठंडी, साफ़ हवा अंदर लेते हैं... और धीरे से बाहर छोड़ते हैं...

दूर के पहाड़ अब छिप गए हैं। लाल छत वाला छोटा घर भी छिप गया है। पतली पगडंडी भी छिप गई है। चारों ओर बस नरम सफ़ेदी है।

पहले मन में आता है, "दुनिया कहाँ चली गई?" पर फिर महसूस होता है। सब कुछ यहीं है। सब बस एक नरम, सफ़ेद चादर के नीचे आराम कर रहा है।

मेरे मन के भागते-दौड़ते ख़याल भी नरम पड़ जाते हैं। पहाड़ों की तरह, वे भी धुंध के नीचे आराम करते हैं।

धीरे-धीरे... हौले-हौले... धुंध आगे बढ़ती है।

नन्ही जान, नरमी की भी अपनी ताक़त होती है। वह जल्दी नहीं करती। शोर नहीं मचाती। बस प्यार से सब कुछ ढक लेती है, और पूरी दुनिया धीमी हो जाती है।

बाद में सूरज निकलेगा। धुंध छँट जाएगी, और चाय की पत्तियाँ चमक उठेंगी। पत्तियाँ तोड़ने वाले लोग पीठ पर टोकरियाँ लेकर आएँगे। पर अभी नहीं। अभी तो दुनिया शांत है, ठंडी है, नरम है।

चलो, यहीं आराम करते हैं... सफ़ेदी में लिपटे हुए... पहाड़ों की तरह... धुंध की तरह... हौले-हौले... हौले-हौले...

कहानी की सीख
“नरमी पूरी दुनिया को ढक सकती है।”

गर्भ संवाद

धुंध ने पहाड़ों को धीरे-धीरे, प्यार से ढक लिया। धुंध की तरह नरमी से आराम करो। मैं तुम्हें अपने प्यार में लपेट रही हूँ, नन्ही जान।

इसे धीरे-धीरे बोलकर सुनाइए, चाहें तो अपने शब्दों में।

मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, नन्ही जान। तुम सुरक्षित हो। हम साथ हैं।

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