शांति: सुकून भरी कहानियाँ
बारिश के बाद इंद्रधनुष
नई कहानी · लगभग 3 मिनट · 19वाँ सप्ताह
कई दिनों की बारिश के बाद इंद्रधनुष निकलता है, पूरा गाँव बाहर आ जाता है।
हेलो, नन्ही जान। मैं मम्मा हूँ। आज तुम्हारे लिए एक कहानी है।
कई दिनों से बारिश हो रही है। टीन की छतों पर टप-टप। आम के पत्तों से टिप-टिप। गलियाँ गीली हैं। आसमान बादलों से ढका है।
हम खिड़की के पास बैठे हैं, सूखे और आराम से। चलो, सुनते हैं... टप-टप... टप-टप...
गाँव के बच्चे घर में बैठे-बैठे ऊब गए हैं। वे खिड़कियों से नाक सटाकर बाहर देखते हैं। "धूप कब लौटेगी?" वे पूछते हैं।
बरामदे में बूढ़े दादाजी मुस्कुराते हैं। उन्होंने बहुत सारी बारिशें देखी हैं। वे धीरे से कहते हैं, "थोड़ा रुको... रंग आने ही वाले हैं।"
धीरे-धीरे बारिश हल्की होती है। टप... टप... टिप... टिप... और फिर, थम जाती है।
हवा ताज़ी और ठंडी है। एक चिड़िया अपने पंखों से पानी झाड़ती है। गीली मिट्टी से सौंधी खुशबू आती है। बादल के पीछे से धूप की एक पतली किरण झाँकती है।
तभी एक छोटी बच्ची पुकारती है, "देखो! ऊपर देखो!"
पूरे आसमान में एक इंद्रधनुष है। रंगों का एक बड़ा, नरम-सा धनुष, खेतों के इस छोर से उस छोर तक।
एक-एक करके दरवाज़े खुलते हैं। बच्चे दौड़कर गीली घास पर आ जाते हैं। माँएँ छोटे बच्चों को गोद में लिए बाहर आती हैं। दादियाँ-नानियाँ चौखट पकड़कर धीरे-धीरे बाहर निकलती हैं। गायें भी सिर उठाकर देखती हैं।
सब ऊपर देखते हैं। चलो, हम भी ऊपर देखते हैं... चलो, एक-एक करके रंगों के नाम लेते हैं।
लाल... जैसे दुल्हन की चूड़ियाँ। नारंगी... जैसे गेंदे के फूल। पीला... जैसे गुनगुनी धूप।
हरा... जैसे भीगे हुए धान के खेत। नीला... जैसे साफ़, शांत आसमान।
गहरा नीला... जैसे तारे निकलने से ठीक पहले की रात। और बैंगनी... जैसे पका हुआ जामुन।
लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, गहरा नीला, बैंगनी। सात नरम रंग, एक के पास एक। हर रंग अगले रंग के लिए जगह बनाता है।
दादाजी अपनी लाठी पर टिके खड़े हैं। उनकी आँखें चमक रही हैं। बच्चे एक-दूसरे का हाथ थाम लेते हैं। बड़े-बूढ़े सिर हिलाते हैं। थोड़ी देर कोई कुछ नहीं बोलता। पूरा गाँव बस खड़ा होकर देखता है, शांत और खुश।
नन्ही जान, कुछ दिन ऐसे ही बादलों भरे होते हैं, इन बारिश वाले दिनों जैसे। कुछ दिन हम बस इंतज़ार करते रहते हैं। पर हम दादाजी की तरह, शांत मन से इंतज़ार कर सकते हैं।
तो बादलों वाले दिनों में, मैं तुम्हारे कान में धीरे से कहूँगी... थोड़ा रुको... रंग आने ही वाले हैं।
धीरे-धीरे इंद्रधनुष शाम के आसमान में घुल जाता है। पर गाँव के चेहरे पर मुस्कान बनी रहती है। और हमारे चेहरे पर भी।
चलो, ताज़ी, ठंडी हवा में साँस अंदर लेते हैं... और बाहर छोड़ते हैं... थोड़ा रुको... रंग आने ही वाले हैं।
“हर बारिश के बाद रंग आते हैं।”
गर्भ संवाद
दादाजी ने शांत मन से इंतज़ार किया, और रंग आ गए। हर बारिश के बाद रंग आते हैं, नन्ही जान। हम भी साथ मिलकर ऐसे ही इंतज़ार करेंगे।
इसे धीरे-धीरे बोलकर सुनाइए, चाहें तो अपने शब्दों में।
मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, नन्ही जान। तुम सुरक्षित हो। हम साथ हैं।
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