गर्भ में शिशु को पढ़कर सुनाने का महत्व
गर्भावस्था के बीच के महीनों से शिशु आवाज़ें सुनने लग सकता है। शब्द चाहे जो हों, शिशु के लिए ख़ास है आपकी आवाज़ — उसकी लय और अपनापन।
गर्भशिक्षा की ओर से · · पढ़ने में 2 मिनट
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आपका शिशु क्या सुनता है
गर्भ में शिशु लगभग 19वें सप्ताह से आवाज़ सुनकर हरकत करने लग सकते हैं, और तीसरी तिमाही तक ज़्यादातर शिशु भारी, गहरी आवाज़ों पर हलचल करने लगते हैं। बाहर की आवाज़ें शिशु तक दबी-दबी पहुँचती हैं, जैसे पानी के भीतर से आ रही हों। आपकी अपनी आवाज़ बाकी आवाज़ों से अलग तरह से पहुँचती है: वह हवा के साथ-साथ आपके शरीर से होकर भी जाती है, इसलिए हो सकता है कि शिशु को सबसे साफ़ आपकी ही आवाज़ सुनाई दे।
इसीलिए गर्भ संस्कार में माँ की आवाज़ का हमेशा ख़ास स्थान रहा है। श्लोक, लोरियाँ, पेट पर हाथ रखकर सुनाई गई कहानियाँ — धड़कन सुनने वाली मशीनों से बहुत पहले से दादी-नानी जानती थीं कि एक शांत, जानी-पहचानी आवाज़ शिशु के लिए पहला उपहार है। शोध भी बताते हैं कि जन्म के कुछ ही दिनों में शिशु किसी दूसरी महिला की आवाज़ के मुक़ाबले माँ की आवाज़ ज़्यादा पसंद करते हैं।
शिशु कहानी नहीं, आपको सुन रहा है।
रोज़ पाँच मिनट कैसे निकालें
आपको शांत कमरे या किसी तय दिनचर्या की ज़रूरत नहीं। ज़्यादातर माँएँ दिन के किसी ऐसे पल के साथ पढ़ना जोड़ लेती हैं, जो रोज़ आता ही है:
- शाम की चाय के साथ, जब आप कुछ देर सुस्ताने बैठती हैं।
- सोने से ठीक पहले, जब घर शांत हो और शिशु की हलचल महसूस हो।
- रविवार की किसी फ़ुर्सत भरी सुबह, जब घर का कोई अपना भी एक पन्ना पढ़कर सुनाए।
कोई दिन छूट गया? बस कल फिर से शुरू करें। आदत हफ़्तों में बनती है, किसी एक शाम में नहीं।
क्या पढ़ें? जो आपके मन को भाए
जो भी आपको धीरे-धीरे पढ़ना अच्छा लगे: कोई छोटी कहानी, अर्थ सहित कोई श्लोक, या बचपन की किसी पसंदीदा किताब का एक पन्ना। पढ़ते हुए चेहरे पर मुस्कान आए और साँसें सहज हो जाएँ, तो समझिए यही सुकून असल बात है। कोई एक सही किताब नहीं होती, और देर तक पढ़ने की भी ज़रूरत नहीं।
आज रात यह आज़माइए
आराम से बैठ जाएँ, पेट पर हाथ रखें, और हमारी कोई कहानी धीरे-धीरे पढ़कर सुनाएँ। पढ़ने के बाद अपने शब्दों में शिशु से दो-तीन बातें कहें। बस — आज का गर्भ संस्कार हो गया।
आज रात सुनाइए: चंदा की लोरी
27वाँ सप्ताह · 2 मिनट · पढ़कर सुनाइए