दुनिया भर में गर्भ संस्कार: जन्म से पहले शिशु से बातें
भारत में गोदभराई और वलैकाप्पु, कोरिया में तैग्यो, जापान में ताइक्यो: जानिए दुनिया भर की गर्भ संस्कार जैसी परंपराएँ, और विज्ञान क्या कहता है।
गर्भशिक्षा की ओर से · · पढ़ने में 7 मिनट
रिया को नौकरी के लिए दक्षिण कोरिया के सियोल शहर आए कुछ ही दिन हुए थे कि उसे पता चला, वह माँ बनने वाली है।
20वें हफ़्ते में एक दिन वह ऑफ़िस में साथ काम करने वाली जी-वू के साथ लंच कर रही थी। जी-वू की डिलीवरी रिया से एक महीना पहले होनी थी। जी-वू ने अपने बैग से तस्वीरों वाली एक पतली-सी किताब निकाली।
"यह मेरे तैग्यो के लिए है," उसने कहा। "मैं रोज़ रात शिशु को एक कहानी सुनाती हूँ। किसी-किसी रात मेरे पति सुनाते हैं।"
रिया ने चॉपस्टिक नीचे रखीं और पूछा, "तैग्यो क्या होता है?"
जी-वू ने उँगलियों पर गिनाया, "शिशु से बातें करना। प्यारी कहानियाँ पढ़कर सुनाना। शांत संगीत सुनना। मन शांत रखना। और घरवालों को भी साथ लेना।"
रिया हँस पड़ी, "हमारे यहाँ भारत में, मेरी माँ इसे गर्भ संस्कार कहती हैं।"
दो देशों की दो महिलाएँ, एक ही मेज़ पर, एक ही चीज़ की बात कर रही थीं। रिया सोच में पड़ गई: दुनिया में और कहाँ-कहाँ, जन्म से पहले ही शिशु का ऐसे स्वागत होता है?
पता चला, बहुत जगहों पर।
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भारत: जहाँ शिशु गर्भ में ही सुनता है
भारत में इस सोच का नाम भी है और लंबा इतिहास भी। 'गर्भ' यानी कोख, और 'संस्कार' यानी वे अच्छी बातें और अच्छी छाप, जो इंसान को गढ़ती हैं।
दो पुरानी कहानियाँ बताती हैं कि यह विश्वास कितना गहरा है:
- अभिमन्यु: महाभारत में कहा गया है कि जब अर्जुन सुभद्रा को चक्रव्यूह के बारे में समझा रहे थे, तब गर्भ में अभिमन्यु भी सुन रहे थे। यह कहानी यहाँ पढ़िए: अभिमन्यु और चक्रव्यूह।
- प्रह्लाद: भागवत पुराण के अनुसार, जब नारद मुनि माँ कयाधु को उपदेश दे रहे थे, तब प्रह्लाद गर्भ में ही सुन रहे थे। पढ़िए: भक्त प्रह्लाद का अटूट विश्वास।
इसमें संगीत भी शामिल था। घर के संस्कारों पर एक पुराना ग्रंथ है, आश्वलायन गृह्यसूत्र। इसके अनुसार सीमंतोन्नयन संस्कार में दो वीणा-वादक होने वाली माँ के लिए गीत गाते थे। आज बहुत-से परिवार इसे सीमंतम या गोदभराई के रूप में मनाते हैं।
आज गर्भ संस्कार इससे कहीं आसान है: हर दिन कुछ मिनट का सुकून, जिसमें कहानी, श्लोक, संगीत और शिशु से दो मीठी बातें हों। यह सब कहाँ से आया, यह हमारी आसान गाइड में पढ़िए।
चीन, कोरिया और जापान: एक सोच, तीन नाम
रिया को सबसे ज़्यादा हैरानी इसी बात पर हुई। पूर्वी एशिया में इसका नाम उन्हीं दो अक्षरों से लिखा जाता है। एक का मतलब है गर्भ, और दूसरे का शिक्षा।
- चीन में इसे ताइजियाओ कहते हैं। 2,000 साल से भी पुरानी एक किताब है, लियू शियांग की 'आदर्श महिलाओं की जीवनियाँ'। इसमें राजा वेन की माँ, ताई रेन की कहानी है। गर्भ के दिनों में वे बुरी चीज़ें देखने और कठोर आवाज़ें सुनने से बचती रहीं, और सोच-समझकर ही बोलती थीं। रात में संगीतकार उन्हें कविताएँ गाकर सुनाते थे।
- कोरिया में इसे तैग्यो कहते हैं। यह सदियों पहले चीन से कोरिया पहुँचा। सन 1800 में यी साजुदांग नाम की एक विद्वान महिला ने इस पर पूरी किताब लिखी, 'तैग्यो सिंगी'। आज कोरिया में गर्भावस्था की लगभग हर किताब में तैग्यो पर एक हिस्सा होता है: शांत संगीत, पढ़कर सुनाई जाने वाली कहानियाँ, और पिता का साथ।
- जापान में इसे ताइक्यो कहते हैं। यह आज भी जापान में आम शब्द है, और इसका सीधा मतलब है जन्म से पहले शिशु की देखभाल।
भारत और चीन एक-दूसरे से कितनी दूर हैं, फिर भी दोनों के पुराने ग्रंथों में होने वाली माँ के लिए संगीत की बात है।
सातवें महीने की रस्म: गोदभराई, वलैकाप्पु और मितोनी
कई जगहों पर सातवें महीने के आसपास परिवार इकट्ठा होकर माँ को आशीर्वाद देता है।
उत्तर भारत में इसे गोदभराई कहते हैं, यानी गोद भरना। बड़े-बुज़ुर्ग माँ की गोद फल, मिठाई और उपहारों से भरते हैं, और ढेरों आशीर्वाद देते हैं।
तमिलनाडु में इसे वलैकाप्पु कहते हैं। महिलाएँ माँ की कलाइयों में काँच की लाल-हरी चूड़ियाँ पहनाती हैं और उसके लिए गीत गाती हैं। कई परिवार मानते हैं कि चूड़ियों की मीठी खनक शिशु तक पहुँचती है। चूड़ियाँ आपको भी अच्छी लगती हैं, तो हमारा शांत खेल चूड़ी सजाओ खेलकर देखिए।
इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर बहुत-से परिवार मितोनी मनाते हैं। परिवार और दोस्त इकट्ठा होते हैं, माँ को बाटिक के कपड़ों में लपेटा जाता है और उस पर पानी डालकर आशीर्वाद दिया जाता है। फिर सब मिलकर रुजक खाते हैं, यानी खट्टी-मीठी-तीखी फलों की चाट।
खाना अलग, कपड़े अलग, गीत अलग। पर सबके पीछे एक ही संदेश: तुम अकेली नहीं हो, और इस शिशु को सब अभी से बहुत प्यार करते हैं।
यूरोप: एक कोमल स्पर्श और एक गीत
फ़्रांस में कुछ माता-पिता हैप्टोनॉमी सीखते हैं। यह तरीक़ा नीदरलैंड के फ़्रांस वेल्डमैन ने शुरू किया था। इसमें पेट को हल्के से छूकर और अपनी आवाज़ से शिशु से जुड़ने की कोशिश की जाती है, और पति भी इसमें साथ दे सकते हैं।
फ़्रांस में मिडवाइफ़ और गाना सिखाने वाले टीचर लगभग पाँचवें महीने से गर्भवती माँओं के लिए गाने की क्लास भी चलाते हैं। इनमें पिता को भी बुलाया जाता है।
और दुनिया भर के घरों में बहुत-से माता-पिता रोज़ रात शिशु से बातें करते हैं, पर इसे कोई नाम नहीं देते।
हर परंपरा में क्या एक जैसा है?
इन सब परंपराओं को साथ रखकर देखें, तो वही कुछ बातें बार-बार दिखती हैं:
- शांत माँ
- एक जानी-पहचानी आवाज़
- प्यारी कहानियाँ और संगीत
- आसपास जुटा परिवार
- जन्म से पहले ही शिशु के लिए प्यार
विज्ञान भी इसके एक छोटे-से हिस्से को सही मानता है। लगभग 19वें हफ़्ते से शिशु आवाज़ सुनकर हरकत करने लग सकता है। जन्म के क़रीब आते-आते लगता है कि शिशु माँ की आवाज़ पहचानने लगता है। और नवजात शिशु किसी दूसरी महिला के मुक़ाबले अपनी माँ की आवाज़ ज़्यादा पसंद करते हैं।
पर विज्ञान से यह साबित नहीं होता कि कोई भी परंपरा शिशु को ज़्यादा होशियार बनाती है, या तय करती है कि बच्चा आगे चलकर कैसा होगा। पुराने समय में लोग ऐसा पक्का मानते थे, और उस विश्वास के पीछे छिपे प्यार का हम आज भी आदर करते हैं। असली तोहफ़ा तो इससे भी सीधा है: आपके लिए सुकून, और एक आवाज़ जिसे शिशु पहचानने लगता है।
इस पर और पढ़िए: गर्भ में शिशु को पढ़कर सुनाने का महत्व।
फिर क्या हुआ?
रिया और जी-वू ने तय किया कि हर शुक्रवार लंच पर दोनों एक-दूसरे को कुछ नया सिखाएँगी।
जी-वू ने रिया को एक कोरियाई लोरी सिखाई। रिया ने जी-वू को असतो मा सद्गमय का अर्थ बताया: मुझे असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। जी-वू ने इसे एक पर्ची पर लिखा और अपनी डेस्क पर चिपका लिया।
पहले जी-वू के घर किलकारी गूँजी। एक महीने बाद रिया के घर भी।
वीडियो कॉल पर रिया की माँ ने पूछा, "इतनी दूर रहकर भी गर्भ संस्कार कर पाई?" रिया मुस्कुराई, "हाँ माँ, बस थोड़ी मदद कोरिया से मिल गई।"
कहीं भी रहती हों, रोज़ थोड़ा सुकून चाहिए? गर्भशिक्षा दुनिया के किसी भी कोने में रह रही माँओं तक गर्भ संस्कार पहुँचाती है। आप गर्भावस्था के जिस हफ़्ते में हैं, उसके हिसाब से यह हर दिन कुछ छोटी-छोटी गतिविधियाँ चुनती है: पढ़कर सुनाने के लिए कोई कहानी, अर्थ के साथ कोई श्लोक, कोई हल्की पहेली या लोरी। यह मुफ़्त है, हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में है, और आज की पहली गतिविधि आप बिना अकाउंट बनाए आज़मा सकती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
गर्भ संस्कार जैसी परंपराएँ क्या हैं? ये कई देशों की पुरानी आदतें हैं, जो माँ को शांत रहने और जन्म से पहले ही शिशु से जुड़ाव महसूस करने में मदद करती हैं। इनमें सबसे आम हैं: शिशु से बातें करना, पढ़कर सुनाना, संगीत और परिवार का आशीर्वाद।
जापान में ताइक्यो क्या है? ताइक्यो जापानी शब्द है, जिसका मतलब है जन्म से पहले शिशु की देखभाल। यह गर्भ और शिक्षा के उन्हीं दो अक्षरों से लिखा जाता है, जिनसे चीन में ताइजियाओ और कोरिया में तैग्यो।
क्या गर्भ संस्कार सिर्फ़ भारत की परंपरा है? इसका नाम और जड़ें भारत की हैं। पर इसकी असली बात, यानी सुकून, संगीत और शिशु से बातें, दुनिया के कई देशों में मिलती है।
गर्भ में शिशु मेरी आवाज़ कब से सुनने लगता है? लगभग 19वें हफ़्ते से शिशु आवाज़ सुनकर हरकत करने लग सकता है। जन्म के क़रीब आते-आते लगता है कि शिशु माँ की आवाज़ पहचानने लगता है।
क्या ये परंपराएँ शिशु को होशियार बनाती हैं? इसका कोई पक्का सबूत नहीं है। पर इनसे जो मिलता है, वह सच्चा और सीधा-सादा है: आपके लिए सुकून के पल, और एक आवाज़ जिसे शिशु पहचानने लगता है।