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12 श्लोक · जन्म के बाद से

नवजात शिशु के स्वागत के श्लोक और आशीर्वाद

घर में नन्हे मेहमान के आने पर भारतीय परिवार सदियों से आशीर्वाद के शब्दों से उसका स्वागत करते आए हैं। सबसे पहले जातकर्म संस्कार का श्लोक है — वह पारंपरिक पहला आशीर्वाद, जो नवजात शिशु के कान में धीरे से कहा जाता है: ‘तुम मेरे हृदय का अंश हो, सौ शरद जियो।’ ‘पुत्र’ शब्द का अर्थ बेटा भी होता है और संतान भी; बहुत-से परिवारों की तरह हम इसे ‘संतान’ के अर्थ में पढ़ते हैं, इसलिए इसे बेटी हो या बेटा, दोनों के लिए बोलिए। साथ ही ‘भए प्रगट कृपाला’ के वे पद हैं, जिनमें माता कौशल्या अचरज से भर उठती हैं, रामचरितमानस से राम के नामकरण का प्रसंग है, और लोरी की तरह गाने के लिए मधुराष्टकम्।

ये श्लोक जन्म के बाद के लिए हैं: शिशु के साथ पहले शांत पल, नामकरण का दिन, और आगे के हफ़्तों में उसे सुलाने का समय। शिशु को गोद में लेकर कोई पंक्ति फुसफुसाइए, या धीमे स्वर में गाइए। दादा-दादी, नाना-नानी और पूरा परिवार साथ जुड़ सकता है। अगर गर्भावस्था में आप कोई श्लोक अक्सर गाती थीं, तो उसे अब भी गा सकती हैं — हो सकता है, शिशु को वह जाना-पहचाना-सा लगे।

ये श्लोक आशीर्वाद हैं और शिशु से जुड़ने का एक प्यारा तरीका — शिशु की देखभाल की सलाह नहीं। दूध पिलाने, नींद, और शिशु की या अपनी सेहत से जुड़ी हर बात में अपने डॉक्टर और नर्स की सलाह मानिए। ज़रूरी सूचना पढ़ें

इन श्लोकों को कैसे जपें

नीचे के हर श्लोक के लिए — जब तक उसके साथ कुछ और न लिखा हो।

सबसे अच्छा समय
जन्म के समय, नामकरण के दिन, सोते समय
जपने का तरीका
फुसफुसाकर बोलें या धीमे स्वर में गाएँ
कौन जप सकता है
माता-पिता और दादा-दादी, नाना-नानी
सबसे सही सप्ताह
जन्म के बाद से

सच कहें तोयह एक आशीर्वाद है और शिशु से जुड़ाव की एक रस्म। जन्म से पहले बार-बार सुनी आवाज़ें शिशु को जानी-पहचानी लग सकती हैं।

नवजात शिशु को पहला आशीर्वाद

मेरे हृदय से तुम्हारा जन्म (जातकर्म)

अङ्गादङ्गात्सम्भवसि हृदयादधिजायसे ।आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम् ॥

कौषीतकि उपनिषद् 2.11; आश्वलायन गृह्यसूत्र 1.15

अर्थ

तुम्हारा जन्म मेरे अंग-अंग से हुआ है, मेरे हृदय से हुआ है। संतान के रूप में तुम मेरी अपनी ही आत्मा हो। सौ शरद ऋतुओं तक जियो।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

यह वह पारंपरिक पहला आशीर्वाद है, जो नवजात शिशु को धीरे से, फुसफुसाकर सुनाया जाता है। ‘पुत्र’ का अर्थ बेटा भी होता है और संतान भी; हम इसे ‘संतान’ के अर्थ में पढ़ते हैं, इसलिए इसे बेटी और बेटे — दोनों के लिए बोलिए।

इससे क्या मिल सकता है

यह सबसे ज़्यादा मन को छू लेने वाले पलों में से एक है। जब शिशु आपके सीने से सटा हो और उसकी त्वचा आपकी त्वचा से लगी हो, तब इसे फुसफुसाकर कहिए।

सबसे अच्छा समय
जन्म के तुरंत बाद

मज़बूती का आशीर्वाद

पत्थर जैसी मज़बूती, सोने जैसी चमक

अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्रुतं भव ।वेदो वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम् ॥

आश्वलायन गृह्यसूत्र 1.15; पारस्कर गृह्यसूत्र 1.16

अर्थ

पत्थर की तरह अडिग बनो। कुल्हाड़ी की तरह तेज़ बनो। खरा, सदा टिकने वाला सोना बनो। संतान के रूप में तुम स्वयं ज्ञान हो। सौ शरद ऋतुओं तक जियो।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

यह जन्म-संस्कार का पुराना आशीर्वाद है — मज़बूती का, और ऐसे मोल का जो कभी कम न हो।

इससे क्या मिल सकता है

आपके शिशु के शुरुआती दिनों के लिए गर्व और ख़ुशी से भरा आशीर्वाद।

लंबी, सेहतमंद ज़िंदगी

हम सौ शरद देखें

पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ॥

शुक्ल यजुर्वेद 36.24

अर्थ

हम सौ शरद ऋतुओं तक देखें, जिएँ, सुनें और बोलें, कभी कमज़ोर न पड़ें — और सौ के बाद भी ऐसे ही रहें।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

आपके शिशु और आपके परिवार की लंबी, सेहतमंद ज़िंदगी के लिए आशीर्वाद।

इससे क्या मिल सकता है

नामकरण संस्कार पर पूरे परिवार के साथ मिलकर बोलने के लिए ख़ुशी भरा मंत्र।

कौन जप सकता है
पूरा परिवार

माँ का अचरज

भए प्रगट – वे मेरे गर्भ में रहे

ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै ।मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर पति थिर न रहै ॥उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै ।कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै ॥

रामचरितमानस, बालकांड 192 (छंद, पद 3) · अवधी

अर्थ

कौशल्या कहती हैं: वेद कहते हैं कि आपके रोम-रोम में पूरे-के-पूरे ब्रह्मांड बसे हैं, फिर भी आप मेरे गर्भ में रहे। प्रभु मुस्कुराए और उन्होंने कौशल्या को एक मीठी कथा सुनाई, ताकि वे उन्हें अपनी संतान मानकर प्रेम करें।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

यहाँ एक माँ अचरज से भर उठती है कि स्वयं ईश्वर उसके भीतर रहे। हर माँ के मन में यही अचरज होता है।

इससे क्या मिल सकता है

जन्म के बाद गहरी भावुकता और आभार का एहसास।

यह भी देखें: प्रेगनेंसी में रामायण की चौपाई: भए प्रगट कृपाला और राम जन्म

शिशु का पहला रोना

भए प्रगट – नन्हे शिशु की तरह खेलो

माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा ।कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा ॥सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा ।यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा ॥

रामचरितमानस, बालकांड 192 (छंद, पद 4) · अवधी

अर्थ

माँ बोलीं: “मेरे लाल, यह भव्य रूप छोड़ दो। नन्हे शिशु की तरह खेलो; यही सबसे बड़ा सुख है।” उनकी बात सुनकर प्रभु शिशु बन गए और रोने लगे।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

भारतीय काव्य में जन्म के सबसे कोमल पलों में से एक। शिशु का पहला रोना — यही वह उपहार है, जो माँ माँगती है।

इससे क्या मिल सकता है

ख़ुशी के आँसू। नवजात के शुरुआती हफ़्तों के लिए एकदम सही लोरी।

यह भी देखें: प्रेगनेंसी में रामायण की चौपाई: भए प्रगट कृपाला और राम जन्म

आभार

भए प्रगट – मैं आपकी स्तुति कैसे करूँ

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता ।माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता ॥करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता ।सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता ॥

रामचरितमानस, बालकांड 192 (छंद, पद 2) · अवधी

अर्थ

दोनों हाथ जोड़कर कौशल्या कहती हैं: हे अनंत, मैं आपकी स्तुति कैसे करूँ? दया और सुख के सागर, आप मेरे लिए प्रकट हुए हैं।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

तुलसीदास के शब्दों में एक माँ का आभार।

इससे क्या मिल सकता है

मन में धन्यवाद का भाव।

यह भी देखें: प्रेगनेंसी में रामायण की चौपाई: भए प्रगट कृपाला और राम जन्म

नामकरण का दिन

आनंद के सागर – उनका नाम है राम

जो आनंद सिंधु सुखरासी ।सीकर तें त्रैलोक सुपासी ॥सो सुखधाम राम अस नामा ।अखिल लोक दायक बिश्रामा ॥

रामचरितमानस, बालकांड 197 (ऋषि वसिष्ठ द्वारा नामकरण) · अवधी

अर्थ

जो आनंद के सागर हैं, जिनकी एक बूँद से ही तीनों लोकों को ताज़गी मिल जाती है — सुख के उस धाम का नाम राम है, जो सबको चैन देते हैं।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

यह रामायण में नामकरण का प्रसंग है — आपके शिशु के नामकरण संस्कार के लिए एकदम सही।

इससे क्या मिल सकता है

नामकरण के दिन पढ़ने के लिए एक सुंदर पाठ।

सबसे अच्छा समय
नामकरण संस्कार

यह भी देखें: प्रेगनेंसी में रामायण की चौपाई: भए प्रगट कृपाला और राम जन्म

जन्म की एक कोमल छवि

पूर्णिमा के चाँद जैसा कृष्ण का जन्म

देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णुः सर्वगुहाशयः ।आविरासीद्यथा प्राच्यां दिशीन्दुरिव पुष्कलः ॥

श्रीमद्भागवत पुराण 10.3.8

अर्थ

जो हर हृदय में बसते हैं, वे विष्णु दिव्य रूप वाली देवकी से वैसे ही प्रकट हुए, जैसे पूर्व के आकाश में पूरा चाँद उगता है।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

यहाँ माँ को ‘देवरूपिणी’ कहा गया है — यानी दिव्य रूप वाली। जन्म भी चाँद के उगने जैसा कोमल है।

इससे क्या मिल सकता है

जन्म और शुरुआती दिनों के लिए एक शांत, सुंदर छवि।

लोरी का सिलसिला बनाए रखना

मधुराष्टकम् – श्लोक 2

वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरम् ।चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥

मधुराष्टकम्, श्लोक 2

अर्थ

उनकी वाणी, उनके कर्म, उनके वस्त्र और उनकी चाल — सब मधुर है। उनका सब कुछ मधुर है।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

अगर आपने गर्भावस्था में मधुराष्टकम् गाया है, तो इसे गाती रहिए। हो सकता है आपके शिशु को यह धुन जानी-पहचानी लगे।

इससे क्या मिल सकता है

हर रोज़ की एक सुकून भरी लोरी।

जपने का तरीका
सोते समय धीमे स्वर में गाएँ

यह भी देखें: प्रेगनेंसी में मधुराष्टकम्: आठों श्लोक

सबके लिए आशीर्वाद

सर्वे भवन्तु सुखिनः

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ॥

पारंपरिक शांति प्रार्थना

अर्थ

सब सुखी हों। सब रोगों से दूर रहें। सब शुभ देखें। किसी को भी दुख न मिले।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

अंत में यह प्रार्थना — आपके शिशु के लिए, आपके परिवार के लिए, और आज जन्म दे रही हर माँ के लिए।

इससे क्या मिल सकता है

शुरुआती दिनों में स्नेह और उदारता से भरा मन।

कौन जप सकता है
पूरा परिवार

सौभाग्य का स्वागत

सौभाग्य के रूप में देवी

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥

देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती), अध्याय 5

अर्थ

जो देवी सभी प्राणियों में सौभाग्य के रूप में बसी हैं, उन्हें मेरा बार-बार प्रणाम।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

बहुत-से परिवार नवजात शिशु का स्वागत ऐसे करते हैं, मानो घर में लक्ष्मी आई हो। यह पंक्ति सौभाग्य को दिव्य मानकर उसका आदर करती है।

इससे क्या मिल सकता है

घर में ख़ुशी और आभार भरा माहौल।

यह भी देखें: या देवी सर्वभूतेषु: गर्भावस्था के लिए 11 मंत्र

प्रभु ने जन्म क्यों लिया

बिप्र धेनु सुर संत हित

बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार ।निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार ॥

रामचरितमानस, बालकांड 192 (‘भए प्रगट’ के बाद का दोहा) · अवधी

अर्थ

ज्ञानियों, गायों, देवताओं और संतों के भले के लिए प्रभु ने मनुष्य के रूप में जन्म लिया — अपनी ही इच्छा से बने ऐसे शरीर में, जो हर सीमा से परे है।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

यह दोहा ‘भए प्रगट’ जन्म-स्तुति को पूरा करता है। हर जन्म दुनिया में भलाई लेकर आता है।

इससे क्या मिल सकता है

एक मक़सद का एहसास और उत्सव की ख़ुशी।

यह भी देखें: प्रेगनेंसी में रामायण की चौपाई: भए प्रगट कृपाला और राम जन्म

स्रोत

हम किसी शोध की बस उतनी ही बात करते हैं, जितनी उसमें सच में पाई गई। ज़्यादातर शोध थोड़े-से लोगों पर हुए हैं, और कोई भी शोध आपके डॉक्टर की सलाह की जगह नहीं ले सकता। ज़रूरी सूचना पढ़ें

  • जन्म से पहले बार-बार सुनी आवाज़ें सीखना

    शोध में क्या पता चला
    जिन शिशुओं ने गर्भावस्था के आख़िरी तीन महीनों में एक बेमतलब, बनाया हुआ शब्द बार-बार सुना, जन्म के बाद उनके दिमाग़ ने उस शब्द की ध्वनियों पर ज़्यादा तेज़ प्रतिक्रिया दी। यानी आख़िरी महीनों में बार-बार सुनी आवाज़ें शिशु सीख और याद रख सकते हैं।
    यह शोध क्या नहीं बताता
    यह आवाज़ों की याद दिखाता है, मतलब की समझ नहीं। यह बुद्धि, भाषा या आगे के विकास पर किसी असर को नहीं दिखाता। शोधकर्ता यह भी चेताते हैं कि गर्भ में विकसित हो रहे सुनने के तंत्र को शोर से नुक़सान पहुँच सकता है।

    Partanen et al. (2013). Learning-induced neural plasticity of speech processing before birth. Proceedings of the National Academy of Sciences of the United States of America 110(37):15145-15150.

    शोध का सारांश पढ़ें (अंग्रेज़ी में)पूरा शोध पढ़ें (अंग्रेज़ी में, मुफ़्त)