शांति: सुकून भरी कहानियाँ
बया का घोंसला
नई कहानी · लगभग 3 मिनट · 18वाँ सप्ताह
बया का एक जोड़ा, तिनका-तिनका बुनकर, नरम झूलता घोंसला बनाता है।
हेलो, नन्ही जान। मैं मम्मा हूँ। आज तुम्हारे लिए एक कहानी है।
सुबह उजली और शांत है। हम गाँव के तालाब के पास, एक ऊँचे ताड़ के पेड़ के नीचे बैठे हैं। घास नरम और ठंडी है। पानी बिल्कुल ठहरा हुआ है।
ऊपर ताड़ के एक लंबे पत्ते पर एक नन्हा पंछी काम में लगा है। यह पापा बया है। वह आने वाले नन्हे बच्चों के लिए घोंसला बना रहा है।
चलो, उसे देखते हैं... धीरे-धीरे... चुपचाप...
वह उड़कर ऊँची घास तक जाता है। एक लंबा, पतला तिनका खींच लेता है। फिर उसे चोंच में दबाकर ऊपर लौट आता है, जैसे कोई हरा रिबन हो।
वह उसे पत्ते के चारों ओर लपेटता है। अंदर खोंसता है। अच्छे से कस देता है। और काम करते-करते गुनगुनाता है। हम्म-हम्म-हम्म... ची-ची... हम्म-हम्म-हम्म...
तिनका-तिनका जुड़ता है, घोंसला बढ़ता है।
वह फिर नीचे जाता है। फिर ऊपर आता है। एक और तिनका... एक और... एक और। ऊपर से, नीचे से, अंदर, बाहर। उसे कोई जल्दी नहीं है। बस ध्यान है, और प्यार।
तभी तालाब के ऊपर से हवा का एक झोंका आता है। सर्र... एक तिनका छूट जाता है। वह नीचे... नीचे... तैरता हुआ आता है, और धीरे से पानी पर बैठ जाता है।
पापा बया पल भर उसे देखता है। वह परेशान नहीं होता। हार नहीं मानता। वह घास तक उड़ता है और एक नया तिनका ले आता है। और गुनगुनाते हुए फिर से शुरू करता है।
तिनका-तिनका जुड़ता है, घोंसला बढ़ता है।
हम रोज़ सुबह देखने आते हैं। धीरे-धीरे घोंसला आकार लेता है। पहले एक छोटा-सा छल्ला। फिर उसके ऊपर एक गोल छत।
एक सुबह मम्मा बया उड़कर आती है। वह घोंसले के चारों ओर फुदकती है। अंदर झाँकती है। हल्के से खींचकर परखती है। फिर धीरे से चहकती है। उसे घोंसला पसंद आ गया! वह खुश होकर मुस्कुरा देती है।
अब पापा बया एक गोल, नरम कमरा बुनता है। फिर नीचे की ओर एक लंबा दरवाज़ा, ताकि अंदर सब सूखा और सुरक्षित रहे। दोनों मिलकर उसे अंदर से आरामदायक बनाते हैं।
शाम की हवा चलती है। घोंसला झूलता है... धीरे-धीरे... इधर-उधर... जैसे आसमान में टँगा कोई नन्हा पालना। दोनों बया दरवाज़े के पास बैठकर आराम करते हैं। पापा बया एक बार फिर अपना धीमा गीत गुनगुनाता है।
नन्ही जान, मैं भी तुम्हारे लिए एक घोंसला बुन रही हूँ। एक धीमी साँस, एक तिनका। एक मीठा गीत, एक तिनका। एक प्यारी बात, एक शांत सैर, रात को पढ़ी एक कहानी... हर एक, एक तिनका है।
कोई जल्दी नहीं है। बस ध्यान है, और प्यार।
तिनका-तिनका जुड़ता है, घोंसला बढ़ता है।
चलो, साँस अंदर लेते हैं... और बाहर छोड़ते हैं... और घोंसले के साथ धीरे-धीरे झूलते हैं...
“घर धैर्य और प्यार से बनता है।”
गर्भ संवाद
तिनका-तिनका, धीरज और प्यार से। मैं तुम्हारे लिए एक गर्म घोंसला बुन रही हूँ। उसमें आराम से, सुरक्षित रहना, नन्ही जान।
इसे धीरे-धीरे बोलकर सुनाइए, चाहें तो अपने शब्दों में।
मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, नन्ही जान। तुम सुरक्षित हो। हम साथ हैं।
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