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12 श्लोक · 28–37 सप्ताह

तीसरी तिमाही में प्रसव के लिए मन को तैयार करने वाले श्लोक

आख़िरी हफ़्तों में उत्साह, थकान और डर — सब एक साथ महसूस हो सकते हैं। ये श्लोक जन्म की ऐसी शांत छवियाँ देते हैं, जिन्हें आप मन में सँजोकर रख सकती हैं। ऋग्वेद में जन्म की तुलना उस हवा से की गई है, जो कमल के तालाब में लहरें उठाती है। अथर्ववेद के श्लोकों में प्रार्थना है कि शरीर तनाव छोड़े और जन्म के लिए खुल जाए। ‘भए प्रगट कृपाला’ में राम के जन्म पर माता कौशल्या की ख़ुशी गाई गई है। गीता के दो श्लोक याद दिलाते हैं कि अपनी ओर से पूरी तैयारी कीजिए, फिर यह सोच छोड़ दीजिए कि प्रसव बिल्कुल वैसा ही हो, जैसा आपने सोचा था।

ज़्यादातर श्लोक 28 से 37 सप्ताह के लिए हैं। दो श्लोक गोद भराई (सीमंतोन्नयन) संस्कार के हैं, जो छठे या आठवें महीने में होता है — चाहें तो उस दिन इन्हें पढ़ सकती हैं। एक-दो श्लोक चुन लीजिए और प्रसव का समय आने तक उन्हें रोज़ एक ही समय पर बोलिए। प्रसव के समय जो आपके साथ रहेंगे, उन्हें भी ये श्लोक सिखा दीजिए। जाने-पहचाने शब्द मुश्किल घड़ी में आसानी से याद आते हैं।

जप से मन शांत रहने में मदद मिल सकती है, पर जप यह तय नहीं कर सकता कि प्रसव कैसे होगा। हर सुरक्षित जन्म अच्छा जन्म है — सिज़ेरियन से हुआ जन्म भी। अपने डॉक्टर या दाई की सलाह मानिए, कोई भी जाँच मत छोड़िए, और कुछ भी ठीक न लगे, तो तुरंत उन्हें फ़ोन कीजिए। ज़रूरी सूचना पढ़ें

इन श्लोकों को कैसे जपें

नीचे के हर श्लोक के लिए — जब तक उसके साथ कुछ और न लिखा हो।

सबसे अच्छा समय
रोज़ एक ही समय पर
जपने का तरीका
अपने 1–2 “प्रसव के श्लोक” चुनें और प्रसव का समय आने तक रोज़ उन्हें दोहराएँ
कौन जप सकता है
माँ और प्रसव के समय साथ रहने वाले
सबसे सही सप्ताह
28–37 सप्ताह

सच कहें तोइससे मन कुछ शांत हो सकता है। यह पक्का नहीं कर सकता कि प्रसव सामान्य ही होगा। हर सुरक्षित जन्म अच्छा जन्म है — सिज़ेरियन से हुआ जन्म भी।

जन्म की एक कोमल तस्वीर

जैसे कमल-ताल पर बहती हवा

यथा वातः पुष्करिणीं समिङ्गयति सर्वतः ।एवा ते गर्भ एजतु निरैतु दशमास्यः ॥

ऋग्वेद 5.78.7

अर्थ

जैसे हवा कमल के तालाब में चारों ओर लहरें उठा देती है, वैसे ही आपका शिशु हिले-डुले और दस महीने पूरे होने पर बाहर आए।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

जन्म की एक कोमल, बहती हुई तस्वीर, जिसमें कोई डर नहीं है। जन्म से जुड़े सबसे जाने-माने वैदिक श्लोकों में से एक।

इससे क्या मिल सकता है

मन में बसाने के लिए जन्म की एक शांत तस्वीर, जो प्रसव का डर कम कर सकती है।

गोदभराई (सीमंतोन्नयन) का श्लोक

राका, पूर्णिमा की देवी

राकामहं सुहवां सुष्टुती हुवे शृणोतु नः सुभगा बोधतु त्मना ।सीव्यत्वपः सूच्याच्छिद्यमानया ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम् ॥

ऋग्वेद 2.32.4; सीमंतोन्नयन संस्कार में इसका पाठ होता है (पारस्कर गृह्यसूत्र 1.15)

अर्थ

मैं पूर्णिमा की दयालु देवी राका को पुकारती हूँ। वे हमारी सुनें। वे कभी न टूटने वाली सुई से अपना काम सिलें। वे एक वीर, उदार और सराहनीय संतान दें।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

यह सीमंतोन्नयन (सीमंतम, गोदभराई) संस्कार का श्लोक है, जो छठे या आठवें महीने में होता है। ‘कभी न टूटने वाली सुई’ एक प्यारी छवि है — जैसे शिशु को बड़े ध्यान से टाँका-टाँका जोड़ा जा रहा हो। हम ‘वीर’ का अर्थ बहादुर संतान लेते हैं — बेटा हो या बेटी।

इससे क्या मिल सकता है

आपकी अपनी गोदभराई से जुड़ा श्लोक। उस दिन इसे पढ़िए।

सबसे सही सप्ताह
24–34 सप्ताह (सीमंतोन्नयन)

माँ के लिए संगीत

सीमंतोन्नयन का गीत

संस्कृत विद्वान की जाँच बाक़ी है

सोम एव नो राजेमा मानुषीः प्रजाः ।अविमुक्तचक्र आसीरंस्तीरे तुभ्यमसौ ॥

आश्वलायन गृह्यसूत्र 1.14

अर्थ

सोम ही हमारे राजा हैं, और इन लोगों के भी। ये लोग, जिनके पहिये कभी नहीं रुकते, तुम्हारी नदी (यहाँ नदी का नाम लें) के किनारे बसे हैं।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

इस संस्कार में दो वीणा-वादक गर्भवती पत्नी को यह गीत सुनाते हैं। इससे पता चलता है कि गर्भावस्था में माँ को संगीत सुनाना भारत का पुराना रिवाज़ है।

इससे क्या मिल सकता है

आपके सीमंतोन्नयन संस्कार के लिए एक अच्छा ‘कहानी’ वाला श्लोक। इसमें अपने इलाक़े की नदी का नाम जोड़िए।

सबसे सही सप्ताह
24–34 सप्ताह (सीमंतोन्नयन)

प्रसव के लिए शरीर को ढीला छोड़ना

वह तनाव छोड़े और जन्म देने को तैयार हो

वषट् ते पूषन्नस्मिन्त्सूतावर्यमा होता कृणोतु वेधाः ।सिस्रतां नार्यृतप्रजाता वि पर्वाणि जिहतां सूतवा उ ॥

अथर्ववेद 1.11.1 (‘सकुशल प्रसव के लिए’)

अर्थ

हे पूषा देव, इस जन्म के समय ज्ञानी पुरोहित अर्यमा आशीर्वाद के मंत्र बोलें। सही समय पर जन्म दे रही स्त्री का शरीर ढीला पड़े। जन्म के लिए उसके जोड़ खुल जाएँ।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

इसमें प्रार्थना है कि शरीर ढीला पड़े और खुले। मन और शरीर सहज रहें, तो प्रसव से गुज़रना कुछ आसान लग सकता है।

इससे क्या मिल सकता है

यह याद दिलाता है कि कंधे और जबड़ा ढीले छोड़ दें और साँस नरम रखें। गर्भावस्था में शरीर को आराम देने वाले अभ्यास के समय इसे दोहराइए।

आप अकेली नहीं हैं

चारों दिशाओं ने रचा शिशु

चतस्रो दिवः प्रदिशश्चतस्रो भूम्या उत ।देवा गर्भं समैरयन्तं व्यूर्णुवन्तु सूतवे ॥

अथर्ववेद 1.11.2

अर्थ

आकाश की चार दिशाएँ हैं, और धरती की भी चार। देवताओं ने मिलकर इस शिशु को रचा है। वे जन्म के लिए राह खोल दें।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

एक शांत और विशाल तस्वीर, मानो पूरा ब्रह्मांड साथ दे रहा हो।

इससे क्या मिल सकता है

यह एहसास कि इस सफ़र में आप अकेली नहीं हैं।

जन्म की ख़ुशी

भए प्रगट कृपाला – पद 1

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी ।हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी ॥लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी ।भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी ॥

रामचरितमानस, बालकांड 192 (छंद) · अवधी

अर्थ

दीनों पर दया करने वाले कृपालु प्रभु कौशल्या जी को सुख देने के लिए प्रकट हुए। उनका अद्भुत रूप देखकर माता ख़ुशी से फूली न समाईं — मनोहर आँखें, बादल जैसा साँवला शरीर, चार भुजाएँ, गले में माला और बड़ी-बड़ी आँखें।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

रामनवमी पर और उत्तर भारत में शिशु से जुड़ी रस्मों में गाई जाने वाली जन्म-स्तुति। यह पूरी स्तुति जन्म पर माँ की ख़ुशी के बारे में ही है।

इससे क्या मिल सकता है

ख़ुशी और उमंग भरा इंतज़ार। गाई जाए तो सुनने में बहुत मधुर लगती है।

यह भी देखें: प्रेगनेंसी में रामायण की चौपाई: भए प्रगट कृपाला और राम जन्म

जन्म की सुहानी घड़ी

नवमी का दिन, न सर्दी न गर्मी

नौमी तिथि मधु मास पुनीता ।सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता ॥मध्यदिवस अति सीत न घामा ।पावन काल लोक बिश्रामा ॥

रामचरितमानस, बालकांड 191 (चौपाई) · अवधी

अर्थ

पवित्र चैत्र महीने की नवमी थी, प्रिय अभिजित मुहूर्त था, ठीक दोपहर का समय था — न बहुत ठंड, न बहुत गर्मी। वह एक पावन घड़ी थी, जब सारा संसार विश्राम में था।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

इसमें जन्म के लिए एक सुहाने, आरामदेह समय का वर्णन है।

इससे क्या मिल सकता है

जन्म की एक सुकून भरी तस्वीर।

सच कहें तोशिशु जिस दिन भी जन्म ले, वह दिन अच्छा है। किसी भी मंत्र के लिए “मुहूर्त” निकलवाकर सिज़ेरियन कराने की ज़रूरत नहीं है।

यह भी देखें: प्रेगनेंसी में रामायण की चौपाई: भए प्रगट कृपाला और राम जन्म

आख़िरी हफ़्तों में हिम्मत

संकटमोचन की टेक

को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो ॥

संकटमोचन हनुमानाष्टक (परंपरा से तुलसीदास की रचना मानी जाती है), टेक · अवधी

अर्थ

हे संकटमोचन हनुमान, संसार में ऐसा कौन है जो आपका नाम नहीं जानता?

हमने यह श्लोक क्यों चुना

घबराहट भरे आख़िरी हफ़्तों के लिए एक दमदार, उम्मीद जगाने वाली पंक्ति।

इससे क्या मिल सकता है

प्रसव से पहले मन में हिम्मत।

प्रसव की तारीख़ पास आने पर उमड़ती भावनाएँ

शरणागत – शरण में आने वालों की रक्षक

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

देवी माहात्म्य 11.12

अर्थ

हे देवी, आप अपनी शरण में आए दीन-दुखियों को बचाने में लगी रहती हैं, आप सबका दुख-दर्द हर लेती हैं — आपको मेरा प्रणाम।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

आख़िरी हफ़्तों में मन में उमड़ती भावनाओं के लिए एक श्लोक।

इससे क्या मिल सकता है

मन को सहारा; प्रसव के समय के लिए भी सँभालकर रखने लायक़ श्लोक।

यह भी देखें: प्रेगनेंसी में दुर्गा सप्तशती

इंतज़ार में धैर्य

धैर्य के रूप में देवी

या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥

देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती), अध्याय 5

अर्थ

जो देवी सभी प्राणियों में धैर्य के रूप में बसी हैं, उन्हें मेरा बार-बार प्रणाम।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

आख़िरी हफ़्ते ऐसे लग सकते हैं जैसे कभी ख़त्म ही नहीं होंगे। यह पंक्ति धैर्य को देवी का रूप मानकर उसका आदर करती है।

इससे क्या मिल सकता है

इंतज़ार के दिन ज़्यादा शांति से कटते हैं।

यह भी देखें: या देवी सर्वभूतेषु: गर्भावस्था के लिए 11 मंत्र

प्रसव की योजना पर पकड़ ढीली करना

अपना काम कीजिए, फल की चिंता छोड़िए

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

भगवद्गीता 2.47

अर्थ

तुम्हारा अधिकार सिर्फ़ अपने कर्म पर है, उसके फल पर नहीं। केवल फल के लिए कर्म मत करो, और कर्म करना छोड़ो भी मत।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

प्रसव शायद ही कभी पूरी तरह योजना के मुताबिक़ होता है। यह श्लोक आपको अच्छी तैयारी करने और फिर चिंता छोड़ देने में मदद करता है।

इससे क्या मिल सकता है

‘एकदम सही प्रसव’ का दबाव कम होता है।

यह भी देखें: गर्भावस्था के लिए गीता के श्लोक

आस्था के साथ मेहनत

जहाँ ज्ञान और मेहनत मिलते हैं

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥

भगवद्गीता 18.78 (गीता का आख़िरी श्लोक)

अर्थ

जहाँ योग के स्वामी श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुष लिए तैयार अर्जुन हैं, वहाँ सौभाग्य, विजय, ख़ुशहाली और सही आचरण होंगे।

हमने यह श्लोक क्यों चुना

आस्था और मेहनत साथ-साथ: एक ओर आपकी प्रार्थनाएँ, दूसरी ओर आपकी देखभाल करने वाले डॉक्टर और नर्स।

इससे क्या मिल सकता है

आख़िरी हफ़्तों में भरोसे के साथ क़दम रखना।

यह भी देखें: गर्भावस्था के लिए गीता के श्लोक